नई दिल्ली : माइक्रोप्लास्टिक उन हानिकारक सूक्ष्म तत्वों में से एक हैं, जिनसे हमारे शरीर को सबसे ज्यादा नुकसान हो सकता है। शोधकर्ता बताते हैं, कई अध्ययनों में पाया गया है कि हमारे शरीर में समय के साथ माइक्रोप्लास्टिक्स की मात्रा बढ़ने का खतरा है। दैनिक जीवन में इस्तेमाल की जाने वाली कई चीजों के कारण इसका जोखिम देखा जा रहा है। प्लास्टिक की बोतल को इसके लिए प्रमुख कारक पाया गया है।
अगर आप भी प्लास्टिक की बोतल में पानी पीते हैं तो सावधान हो जाइए, ये हमारे शरीर में कई गंभीर और क्रोनिक बीमारियों को बढ़ा सकती है, इतना ही नहीं इससे कैंसर जैसे जानलेवा रोगों का भी खतरा हो सकता है।
शोध से पता चलता है कि प्लास्टिक की बोतल में प्रत्येक लीटर पानी में प्लास्टिक के 100,000 से अधिक सूक्ष्म टुकड़े हो सकते हैं। अध्ययन से पता चलता है कि केवल एक बोतल पानी पीने से हम 10 गुना अधिक मात्रा में प्लास्टिक को शरीर में प्रवेश की अनुमति दे रहे होते हैं। प्लास्टिक के छोटे-छोटे टुकड़े जो बोतलों की परतों से निकालते हैं उन्हें माइक्रोप्लास्टिक्स और नैनोप्लास्टिक्स कहा जाता है। ये समय के साथ शरीर में कई बीमारियों का कारक हो सकते हैं।
माइक्रोप्लास्टिक का पता लगाने वाली तकनीक
कोलंबिया यूनिवर्सिटी की टीम ने एक नई इमेजिंग तकनीक विकसित की है जिससे नैनोप्लास्टिक्स का बेहतर तरीके से विश्लेषण करने में मदद मिल सकती है। शोध पेपर को जर्नल प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित किया गया है।
विश्वविद्यालय में पर्यावरण रसायन के विशेषज्ञ और शोधकर्ता बेजान यान कहते हैं, नई तकनीक से हम बेहतर तरीके से पता लगा सकते हैं कि किसी चीज में माइक्रोप्लास्टिक की कितनी मात्रा हो सकती है। इंसानों के लिए माइक्रोप्लास्टिक को पहले के अध्ययनों में भी ‘जहर’ बताया गया है।
बोतल के पानी में हो सकते हैं नैनोप्लास्टिक कण
माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक कणों का पता लगाने के लिए इस नई लेजर-आधारित तकनीक का उपयोग यू.एस. में बेचे जाने वाले बोतलबंद पानी के विश्लेषण के लिए किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि बोतलों के प्रत्येक लीटर पानी में 110,000 से 370,000 प्लास्टिक के टुकड़े हो सकते हैं, जिनमें से लगभग 90% नैनोप्लास्टिक्स और बाकी बड़े माइक्रोप्लास्टिक्स थे।
ये मात्रा इतनी अधिक है कि अगर लगातार इस तरह के पानी का सेवन किया जाता रहे तो कोशिकाओं को गंभीर क्षति होने और कैंसर जैसे रोगों का खतरा तक हो सकता है।
शोधकर्ताओं ने किया अलर्ट
कोलंबिया यूनिवर्सिटी द्वारा किए गए इस शोध के अनुसार, नैनोप्लास्टिक की संख्या प्रति लीटर लाखों में हो सकती है। समय के साथ प्लास्टिक पानी में रिसता रहता है। ये इतने सूक्ष्म कण होते हैं कि हमें नजर नहीं आते हैं, पर असल में धीरे-धीरे शरीर में इनका संचय होता जाता है। अनुसंधान दल आगे के अध्ययनों में नल के पानी का विश्लेषण करने की योजना बना रही है।
अध्ययनकर्ता कहते हैं, कई प्रकार के कैंसर और तंत्रिकाओं से संबंधित विकारों में नैनोप्लास्टिक के शरीर में प्रवेश को प्रमुख कारण माना गया है। प्लास्टिक की बोतल से पानी पीना इसका एक जोखिम कारक है।
प्लास्टिक कणों से कैंसर तक का खतरा
माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक शरीर को कई प्रकार से क्षति पहुंचा सकते हैं। मुख्यरूप से इसके कारण माइक्रोबायोटा में परिवर्तन, आंतों की समस्या, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ने, शरीर में सूजन की समस्या, न्यूरोटॉक्सिसिटी और व्यवहार संबंधी गड़बड़ी हो सकती है।
शोधकर्ताओं ने कहा पर्यावरणीय सूक्ष्म और नैनो-प्लास्टिक के निरंतर संपर्क से मनुष्यों पर पड़ने वाले संभावित स्वास्थ्य प्रभावों के बारे में चिंता बढ़ रही है। ये विभिन्न अंगों और ऊतकों में जमा हो सकते हैं और दीर्घकालिक रूप में कैंसर के विकास को बढ़ावा दे सकते हैं।
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