नई दिल्ली:– निपाह वायरस को लेकर पश्चिम बंगाल में 2 पुष्ट मामलों के सामने आने के बाद चीन सहित एशिया के कई देशों में हवाई अड्डों पर एहतियाती स्क्रीनिंग शुरू कर दी गई है, लेकिन दुनिया के कुछ हिस्सों में जिस तरह यह नैरेटिव गढ़ा जा रहा है कि भारत से निपाह वायरस फैलने का खतरा है, वह पूरी तरह भ्रामक और तथ्यों से परे है, क्योंकि निपाह वायरस कोई नया या भारत में जन्मा वायरस नहीं बल्कि इसकी पहचान करीब तीन दशक पहले 1998-99 में मलेशिया में हुई थी, जहां यह सुअर पालकों और बूचड़खानों में काम करने वाले कर्मचारियों के बीच फैला और देखते ही देखते एक बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट में बदल गया।
वैज्ञानिकों की जांच में सामने आया कि निपाह वायरस का प्राकृतिक भंडार फल खाने वाले चमगादड़ (टेरोपस प्रजाति) हैं, जो लार, मूत्र और अन्य शारीरिक तरल पदार्थों के जरिए वायरस फैलाते हैं। मलेशिया में वनों की कटाई और पर्यावरणीय बदलाव के कारण चमगादड़ मानव बस्तियों और कृषि क्षेत्रों के पास आ गए, जिससे वायरस पहले सूअरों के चारे और पानी को दूषित कर गया और फिर सूअरों से इंसानों में पहुंचा। शुरुआती दौर में इस बीमारी को जापानी एन्सेफलाइटिस समझ लिया गया था, लेकिन मार्च 1999 में मलाया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने मरीजों के नमूनों से एक नए वायरस को अलग कर इसकी पहचान की, जिसका नाम उस गांव के नाम पर निपाह वायरस रखा गया,
जहां इसे पहली बार पाया गया था। इस प्रकोप में मलेशिया में कुल 283 मानव मामले सामने आए, जिनमें 109 लोगों की मौत हुई और मृत्यु दर लगभग 39 प्रतिशत रही, जबकि संक्रमण को रोकने के लिए सरकार को 10 लाख से अधिक सूअरों को मारना पड़ा, जिससे भारी आर्थिक नुकसान हुआ।
निपाह वायरस पैरामाइक्सोविरिडे परिवार के हेनिपावायरस जीनस से जुड़ा है और यह गंभीर एन्सेफलाइटिस और श्वसन संक्रमण का कारण बनता है, जिसका इनक्यूबेशन पीरियड आमतौर पर 5 से 14 दिन का होता है और लक्षण 3 से 4 दिनों में दिखने लगते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि निपाह वायरस से जुड़ा असली सबक यह है कि वन्यजीव,
पालतू पशु और इंसानों के बीच बढ़ता संपर्क भविष्य में ऐसे खतरनाक जूनोटिक रोगों का कारण बन सकता है, इसलिए डर या साजिश की बजाय वैज्ञानिक जानकारी, समय पर निगरानी, त्वरित जांच और सही जनजागरूकता ही इससे निपटने का सबसे प्रभावी तरीका है।













