नई दिल्ली:– अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीति पर बड़ा झटका देने के बाद दुनिया भर में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर अमेरिका में जज चुने कैसे जाते हैं।
अमेरिका में भारत की तरह सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की व्यवस्था है, लेकिन जजों की नियुक्ति का तरीका पूरी तरह अलग है। अमेरिका में दो प्रमुख स्तर की अदालतें होती हैं—फेडरल कोर्ट (सुप्रीम कोर्ट सहित) और स्टेट कोर्ट।
फेडरल जजों की नियुक्ति अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। राष्ट्रपति उम्मीदवार का नाम प्रस्तावित करते हैं, जिसके बाद सीनेट ज्यूडिशियरी कमेटी उसकी योग्यता और रिकॉर्ड की समीक्षा करती है।
फिर पूरी सीनेट में बहुमत से मंजूरी मिलती है और उसके बाद राष्ट्रपति औपचारिक नियुक्ति करते हैं। फेडरल जजों का कार्यकाल आजीवन होता है और उन्हें केवल महाभियोग के जरिए हटाया जा सकता है।
वहीं राज्य स्तर पर जजों के चयन के अलग-अलग तरीके हैं। कुछ राज्यों में जज राजनीतिक दल के आधार पर चुनाव लड़ते हैं और जनता सीधे वोट देती है। कुछ राज्यों में गैर-पार्टी आधारित चुनाव होते हैं।
कई जगह ‘मैरिट सलेक्शन’ या ‘मिसौरी प्लान’ लागू है, जहां एक कमेटी नाम सुझाती है और गवर्नर नियुक्ति करता है, बाद में जनता ‘हां’ या ‘ना’ में वोट देकर जज को बनाए रखने या हटाने का फैसला करती है।
कुछ राज्यों में गवर्नर सीधे नियुक्ति करते हैं, जबकि वर्जीनिया और साउथ कैरोलिना जैसे राज्यों में विधानसभा मतदान से जज चुनती है।
भारत और अमेरिका की व्यवस्था में बड़ा अंतर यह है कि भारत में कॉलेजियम सिस्टम के तहत जज ही जजों का चयन करते हैं और सरकार की भूमिका सीमित होती है, जबकि अमेरिका में राष्ट्रपति और सीनेट की सीधी और अहम भूमिका होती है। यही वजह है कि अमेरिकी न्यायपालिका में नियुक्ति प्रक्रिया अधिक राजनीतिक मानी जाती है, जबकि भारत में इसे न्यायपालिका केंद्रित प्रणाली कहा जाता है।











