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आखिर क्यों मनाते हैं छत्तीसगढ़ का पहला तिहार जानें हरेली पर औजार पूजन, नीम पत्ती, गेड़ी और बुरी नजर से सुरक्षा का रहस्य

NBTV24 by NBTV24
August 12, 2026
in छत्तीसगढ़
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आखिर क्यों मनाते हैं छत्तीसगढ़ का पहला तिहार जानें हरेली पर औजार पूजन, नीम पत्ती, गेड़ी और बुरी नजर से सुरक्षा का रहस्य
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छत्तीसगढ़ :– पहला तिहार हरेली बुधवार को गांव से शहर तक हरियाली, खेती और परंपरा के रंग में सजेगा। खेतों में धान की रोपाई के बाद किसान नांगर, गैंती, कुदाली, फावड़ा समेत कृषि औजारों की पूजा करेंगे। घरों में गुड़ के चीले और पारंपरिक पकवान बनेंगे। बच्चे गेड़ी चढ़कर उत्सव मनाएंगे, जबकि युवा नारियल फेंक जैसी लोकस्पर्धाओं में दमखम दिखाएंगे। आधुनिक दौर में भी हरेली नई पीढ़ी को जड़ों से जोड़ने का अवसर बनेगा।

गांवों में हरेली की सुबह पशुधन की सेवा से शुरू होगी। गाय, बैल और भैंसों को नमक व बगरंडा पत्ता खिलाने की परंपरा निभाई जाएगी। लोहार घर-घर पहुंचकर मुख्य द्वार पर नीम की पत्तियां लगाएंगे और चौखट में कील ठोंकेंगे। किसान उन्हें दाल, चावल, सब्जी या नकद भेंट करेंगे। घरों के बाहर गोबर से पारंपरिक आकृतियां भी बनाई जाएंगी।
शहर में जूना बिलासपुर, तेलीपारा, पुराना बस स्टैंड, दयालबंद, टिकरापारा, मंगला, तिफरा, कोनी, सरकंडा, शंकर नगर चुचुहियापारा और तोरवा में नारियल फेंक स्पर्धाओं का उत्साह रहेगा। प्रतियोगिता में दूरी पहले तय होती है और फिर सीमित प्रयासों में नारियल को निर्धारित दूरी पार कराने की शर्त लगती है। हरेली का स्वरूप अब बदलते समय के साथ आधुनिक भी हो रहा है।

मोबाइल, इंटरनेट मीडिया और डिजिटल मनोरंजन के बीच पारंपरिक खेलों को लेकर नई पीढ़ी में उत्सुकता बढ़ाने के प्रयास हो रहे हैं। गेड़ी, नारियल फेंक और कृषि औजारों की पूजा जैसे आयोजन बच्चों को यह समझाने का माध्यम बन रहे हैं कि आधुनिकता के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों को बचाए रखना भी जरूरी है। यही वजह है कि हरेली आज केवल किसान का पर्व नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी पहचान और अस्मिता को नई पीढ़ी तक पहुंचाने वाला उत्सव बन गया है।
औजारों की पूजा में छिपा श्रम का सम्मान

हरेली का सबसे खास संदेश केवल पूजा नहीं, खेती के प्रति सम्मान है। सावन में खेतों में नई फसल का आधार तैयार हो चुका होता है। किसान अपने औजारों को विश्राम देकर उनकी पूजा करते हैं। यह परंपरा श्रम, साधन और अन्न के रिश्ते को रेखांकित करती है। आज मशीनों ने खेती का तरीका बदला है, लेकिन औजार पूजन की भावना अब भी कायम है।

गेड़ी पर संतुलन, बचपन के खूबसूरत पल

गेड़ी कभी बच्चों का खेल भर नहीं थी, गांव की सामूहिक मस्ती की पहचान थी। बांस की ऊंची गेड़ी पर संतुलन बनाकर चलना अपने आप में कौशल था। अब शहरों में जगह और समय की कमी के कारण इसका प्रदर्शन सीमित हुआ है। फिर भी हरेली पर गेड़ी चढ़ते बच्चे पुरानी तस्वीर को फिर जीवंत कर देते हैं। यही दृश्य नई पीढ़ी को लोकजीवन से जोड़ता है।

ताकत नहीं, तकनीक भी तय करती है नारियल की दूरी

नारियल फेंक प्रतियोगिता में ताकत के साथ निशाना, संतुलन और तकनीक भी मायने रखती है। पहले इसे देखने के लिए चौक और मैदानों में भीड़ जुटती थी। अब मनोरंजन के नए साधनों ने इन खेलों की चमक कुछ कम की है। इसके बावजूद स्थानीय आयोजनों में नारियल फेंक आज भी हरेली की अलग पहचान और सामुदायिक उत्साह को बनाए हुए है।

आओ जाने समझें हम अपने हरेली को इस में क्या-क्या होता है: और क्यों ?

  1. नांगर और कृषि औजारों का पूजन: किसान सुबह अपने हल (नांगर), कुदाली, रापा, गैंती और फावड़े को धोकर साफ करते हैं। फिर चावल, फूल और धूप-दीप से इनकी पूजा कर धरती माता व अन्नदेव का आभार जताते हैं।
  2. मवेशियों को औषधि और नमक: गाय, बैल और भैंसों को इस दिन बीमारी व संक्रमण से बचाने के लिए नमक और ‘बगरंडा’ (अंडी) का पत्ता खिलाया जाता है। यह मवेशियों के प्रति प्रेम और आरोग्य का प्रतीक है।
  3. चौखट पर नीम पत्ती और लोहे की कील: बुरी नजर, तंत्र-मंत्र और बीमारियों से घर-परिवार को बचाने के लिए लोहार घर-घर जाकर मुख्य द्वार (चौखट) पर नीम की पत्तियां लगाते हैं और लोहे की कील ठोंकते हैं।
  4. गोबर से पारंपरिक चित्रकारी (राउत/बैगा परंपरा): घरों के दरवाजे के बाहर गोबर से पारंपरिक आकृतियाँ बनाई जाती हैं, जिसे बुरी शक्तियों व अनिष्ट से सुरक्षा का कवच माना जाता है।
  5. बांस की गेड़ी का रोमांच: बांस की लंबी लाठियों पर काठ (लकड़ी) का पैदान लगाकर बनाई जाने वाली ‘गेड़ी’ पर बच्चे और युवा चढ़ते हैं। कीचड़ भरे रास्तों से सुरक्षित गुजरने की व्यावहारिक कला अब लोक-खेल बन चुकी है।
  6. नारियल फेंक स्पर्धा और गुड़-चीला: चौपालों में नारियल फेंकने का खेल जमता है, जहां निशाना और संतुलन आंका जाता है। घरों में गुड़ का चीला, गुलगुला भजिया और पारंपरिक छत्तीसगढ़ी व्यंजन बनाए जाते हैं।
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