छत्तीसगढ़ :– उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि पीड़िता अपनी मर्जी से आरोपी के साथ गई और आपसी सहमति से संबंध बने, तो इसे अपहरण या जबरदस्ती का अपराध नहीं माना जा सकता। जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस राधाकिशन अग्रवाल की खंडपीठ ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया है।
क्या था पूरा मामला?
गरियाबंद जिले के इंदागांव थाने में 14 जनवरी 2022 को एक पीड़िता ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी। आरोप था कि धर्मेंद्र कुमार नामक युवक उसे शादी का झांसा देकर अपने गांव ले गया और वहां उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। बाद में जातिगत कारणों का हवाला देते हुए विवाह से इनकार कर दिया। इसके आधार पर पुलिस ने अपहरण, दुष्कर्म और SC/ST एक्ट के तहत मामला दर्ज किया था।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ दोष सिद्ध करने में विफल रहा। कोर्ट ने अपने फैसले में पाया कि, डॉक्टर के परीक्षण में पीड़िता के शरीर पर किसी भी प्रकार की चोट के निशान नहीं पाए गए, जो जबरदस्ती के दावे को झुठलाते हैं।
पीड़िता का बयान
सुनवाई में यह बात सामने आई कि पीड़िता अपनी मर्जी से मोटरसाइकिल पर आरोपी के साथ गई थी। उसने स्वीकार किया कि पुलिस रिपोर्ट पर उसने केवल हस्ताक्षर किए थे और परिजनों के दबाव में बयान दिया।
जाफरुद्दीन बनाम केरल राज्य का संदर्भ
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब तक ट्रायल कोर्ट का फैसला पूरी तरह अवैध न हो, तब तक उसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
चूंकि मुख्य अपराध (दुष्कर्म और अपहरण) सिद्ध नहीं हुआ, इसलिए अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत लगाए गए आरोप भी स्वतः ही खारिज हो जाते हैं।
राज्य सरकार की अपील खारिज
निचली अदालत ने 31 अगस्त 2023 को आरोपी धर्मेंद्र कुमार को सभी आरोपों से बरी कर दिया था। राज्य शासन ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन उच्च न्यायालय ने तथ्यों और सबूतों के अभाव में बरी किए जाने के फैसले को यथावत रखा है।













