कोल्हापुर: आज का समय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का है. इसका इस्तेमाल अधिकांश क्षेत्र में किया जा रहा है. इस तकनीक की मदद से कठिन काम को भी आसान बनाया जा सकता है. अब कृषि के क्षेत्र में भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद ली जा रही है, जिससे किसानों को कम लागत में अच्छी कमाई भी हो रही है. अब एआई तकनीक की मदद से किसानों को फसल रोगों की जानकारी भी तुरंत मिलेगी.देखा जाए तो फसल में लगने वाले रोगों के कारण किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है. इस नुकसान को रोकने के लिए शिवाजी विश्वविद्यालय ने एक महत्वपूर्ण रिसर्ज किया है.
शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस नए एआई तकनीक से फसल में होने वाले रोगों के बारे में पता लगाया जा सकता है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी ‘AI’ पर आधारित यह शोध किसानों को फसलों पर होने वाले रोगों के शुरुआती चरण में रोककर उसे फैलने से रोकने में मदद करेगा.AI के जरिए मिलेगी बीमारी की जानकारीपहले फसल की बीमारी का सैंपल लैब में भेजना पड़ता था जिसके कारण बीमारी के बारे में सही समय पर पता नहीं लग पाता था. इस वजह से फसलों की बीमारी बढ़ जाती थी और किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता था. अब AI से नुकसान कम होगा और समय की बचत होगी.इससे पहले बारामती में ‘AI’ के जरिए गन्ने की खेती का प्रयोग देखा गया था. अब शिवाजी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने बताया कि इस नए शोध से किसानों को निश्चित रूप से लाभ होगा.
परियोजना के तकनीकी सलाहकार डॉ. शिवराज थोरात ने ‘ईटीवी भारत’ से बात करते हुए बताया, “महात्मा फुले कृषि विश्वविद्यालय राहुरी के शोधकर्ता एसटी तिलक और आरएल कुलकर्णी द्वारा 1972 में विकसित ‘तिलक सैंपलर’ की मदद से खेत में फसल का नमूना लेकर प्रयोगशाला भेजा जाता था.उन्होंने कहा कि, मौसम और वायरस का अध्ययन कर यह समझने में दो से तीन दिन लगते थे कि फसलों पर किस बीमारी का असर हुआ है. इसके बाद आगे कोई भी कदम बढ़ाने में समय लगता था. हालांकि, अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक का उपयोग कर खेत में लगाए गए सैंपलर की मदद से किसान यह समझ सकेंगे कि, फसल पर किस बीमारी का असर हुआ है. इससे किसान भारी नुकसान से बच जाएंगे.इस बीच, रसायन विभाग द्वारा बेकार चाय की पत्तियों पर शोध किया गया. चाय की पत्तियों से बना ‘डॉट्स नैनो मटेरियल’ फसलों की वृद्धि और फसलों की मजबूती के लिए उपयोगी साबित हो रहा है.
कुल मिलाकर शिवाजी विश्वविद्यालय का कृषि पर शोध किसानों के लिए वरदान साबित हो रहा है.किसने किया शोध?महात्मा फुले कृषि विश्वविद्यालय, राहुरी के शोधकर्ता एस टी तिलक और आर एल कुलकर्णी ने 1972 में खेत में अलग-अलग फसलों पर पाए जाने वाले और हवा के माध्यम से फैलने वाले विभिन्न वायरस का पता लगाने और पहचानने के लिए ‘तिलक एयर सैंपलर’ का इस्तेमाल किया. फसल रोगों को समझने के लिए अभी भी उसी पद्धति का उपयोग किया जाता है.
हालांकि, शिवाजी विश्वविद्यालय, कोल्हापुर से संबद्ध फलटण एजुकेशन सोसायटी के श्रीमंत भैयासाहेब राजेमने कॉलेज, म्हसवड़ के डॉ. सुजीत जाधव, शिवाजी विश्वविद्यालय की बी.ए. डॉ. सुनीता जाधव, बालासाहेब खारदेकर ज्ञानस्त्रोत केंद्र की सहायक लाइब्रेरियन और इस परियोजना के तकनीकी सलाहकार, क्वीन मैरी विश्वविद्यालय, लंदन में एम.एस. (ए.आई.) के छात्र डॉ. शिवराज थोरात और इस्लामपुर के राजाराम बापू टेक्नोलॉजी के छात्र पृथ्वीराज जाधव ने इस संबंध में शोध किया है. पौधों की बीमारियों का पता लगाने के लिए ए.आई. आधारित उपकरण’ शीर्षक वाले इस शोध को भारत सरकार द्वारा पेटेंट प्रदान किया गया है.













