नई दिल्ली : दावा किया जाता है कि कुछ खास प्रजाति के सांप, जैसे- किंग कोबरा के मस्तिष्क में एक उम्र के बाद नागमणि बन जाती है. यह बेशकीमती होती है और जो इसे हासिल कर लेता है, वह बेशुमार धन-दौलत और यश-कीर्ति का मालिक बन जाता है. पर क्या ‘नागमणि’ जैसी कोई चीज होती है? क्या कहता है साइंस…
पौराणिक कथाओं से लेकर तमाम हिंदी फिल्मों और धारावाहिक में सांप के पास ‘नागमणि’ का जिक्र मिलता है. दावा किया जाता है कि कुछ खास प्रजाति के सांप, जैसे- किंग कोबरा के मस्तिष्क में एक उम्र के बाद नागमणि बन जाती है. यह बेशकीमती होती है और जो इसे हासिल कर लेता है, वह बेशुमार धन-दौलत और यश-कीर्ति का मालिक बन जाता है.
ऐसी मान्यता है कि स्वाति नक्षत्र के दौरान जब बारिश की बूंदें किंग कोबरा के मुंह में प्रवेश करती हैं तो नागमणि बनती है. नागमणि किंग कोबरा के फन में बनता है. कहा जाता है कि नागमणि को भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है. कोबरा कभी इसे अपने फन से बाहर नहीं निकालता.
geologyin के मुताबिक सांप के पास नागमणि की बात बहुत विवादित है. विशेषज्ञों की राय है कि सांप के सिर के भीतर मणि अथवा मोती बनने के विचार का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है और यह संभवतः लोककथाओं और अंधविश्वास का परिणाम है.
वैज्ञानिकों के मुताबिक सांपों में भी पित्त की पथरी होती है, ठीक उसी तरह जैसे इंसानों को होती है. बड़े आकार की पथरी से तो पत्थर के टुकड़े भी निकलते हैं. ऐसे में संभव है कि सांप के शरीर से पथरी के कारण बनने वाला पत्थर निकला हो और इसे ‘मणि’ समझ लिया गया हो, और फिर यह भ्रांति लोकप्रिय होती गई.
IFS अफसर सुधा रमन एक ट्वीट में सांप के पास नागमणि की बात को पूरी तरह मिथक बताती हैं. वह लिखती हैं कि अन्य जानवरों की तरह सांप भी हाड़-मांस के बने होते हैं. उनके शरीर में भी कोशिकाएं और मांसपेशियों होती हैं. ऐसी कोई मणि या कोई अन्य कीमती पत्थर नहीं होता है. और न तो सांप किसी को सम्मोहित नहीं कर सकते हैं. नागमणि जैसी भ्रांति के चलते हर साल हजारों सांप मारे जा रहे हैं. पर प्रकाशित एक रिपोर्ट में डॉ. कृष्णा कुमारी छल्ला भी नागमणि के दावे का खंडन करती हैं. वह लिखती हैं कि नागमणि या वाइपर स्टोन यां स्नेक पर्ल जैसी कोई चीज नहीं होती, बल्कि यह एक जानवर की हड्डी या प्लेन पत्थर होता है, जिसका उपयोग अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, भारत और अन्य देशों में सांप के काटने के लिए लोक औषधि के रूप में किया जाता है. 14वीं सदी से यह परंपरा चलती आ रही है और लोगों ने इसे नागमणि बता दिया है.
पर प्रकाशित एक रिपोर्ट में डॉ. कृष्णा कुमारी छल्ला भी नागमणि के दावे का खंडन करती हैं. वह लिखती हैं कि नागमणि या वाइपर स्टोन यां स्नेक पर्ल जैसी कोई चीज नहीं होती, बल्कि यह एक जानवर की हड्डी या प्लेन पत्थर होता है, जिसका उपयोग अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, भारत और अन्य देशों में सांप के काटने के लिए लोक औषधि के रूप में किया जाता है. 14वीं सदी से यह परंपरा चलती आ रही है और लोगों ने इसे नागमणि बता दिया है।













