नई दिल्ली:– असम की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है और इस बार विवाद की जड़ कोई नई नीति नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक पहचान को बदलने का फैसला है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली सरकार ने राज्य के एक प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज से देश के पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद का नाम हटाने का निर्णय लिया है। अब इस संस्थान को ‘बरपेटा मेडिकल कॉलेज और अस्पताल’ के नाम से जाना जाएगा।
इस फैसले ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में एक ऐसा तूफान खड़ा कर दिया है, जिसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई दे रही है। जहां सरकार इसे प्रशासनिक एकरूपता की दिशा में उठाया गया कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे सीधे तौर पर एक महान व्यक्तित्व और एक विशेष समुदाय का अपमान करार दे रहा है।
क्यों बदला गया पूर्व राष्ट्रपति का नाम? सीएम हिमंत ने दी सफाई
मंगलवार को हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में इस नाम परिवर्तन को आधिकारिक मंजूरी दी गई। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस फैसले के पीछे का तर्क देते हुए कहा कि असम के अधिकांश सरकारी मेडिकल कॉलेजों का नाम उन शहरों या स्थानों के नाम पर रखा गया है जहां वे स्थित हैं, जैसे गुवाहाटी, डिब्रूगढ़, सिलचर या जोरहाट। उनके अनुसार, बरपेटा के इस कॉलेज का नाम मौजूदा प्रारूप से मेल नहीं खा रहा था, जिससे अक्सर प्रशासनिक भ्रम पैदा होता था।
सरमा ने यह भी स्पष्ट किया कि कॉलेज के नाम के कारण कई लोग इसे एक निजी संस्थान समझने की भूल कर बैठते थे। हालांकि, मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया है कि पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के सम्मान को ध्यान में रखते हुए, भविष्य में किसी अन्य महत्वपूर्ण संस्थान का नाम उनके नाम पर रखा जाएगा।
‘वोट के लिए और कितनी नफरत बोओगे?’: इमरान प्रतापगढ़ी
सरकार के इस कदम पर कांग्रेस ने कड़ा रुख अपनाया है। राज्यसभा सांसद और शायर इमरान प्रतापगढ़ी ने सोशल मीडिया के माध्यम से मुख्यमंत्री पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि फखरुद्दीन अली अहमद केवल एक पूर्व राष्ट्रपति ही नहीं, बल्कि असम के गौरवशाली ‘सपूत’ थे।
प्रतापगढ़ी ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ‘मुसलमानों से नफरत’ में इस कदर आगे बढ़ गए हैं कि वे उस नाम को मिटा रहे हैं जिस पर राज्य को गर्व होना चाहिए। विपक्ष का मानना है कि चुनाव के समय इस तरह के नाम बदलना केवल ध्रुवीकरण की राजनीति का हिस्सा है और यह उस व्यक्तित्व का अपमान है जिसने देश के सर्वोच्च पद को सुशोभित किया था।
कौन थे फखरुद्दीन अली अहमद?
इस पूरे विवाद के केंद्र में रहे फखरुद्दीन अली अहमद का व्यक्तित्व भारतीय राजनीति में बहुत महत्वपूर्ण रहा है। 13 मई 1905 को दिल्ली में जन्मे अहमद, असम से देश के राष्ट्रपति पद तक पहुंचने वाले पहले व्यक्ति थे। वे भारत के पांचवें राष्ट्रपति थे और डॉ. जाकिर हुसैन के बाद इस पद को संभालने वाले दूसरे मुस्लिम व्यक्ति रहे।
उनका राजनीतिक जीवन देश की आजादी की लड़ाई से शुरू हुआ था, जहां उन्होंने महात्मा गांधी के आह्वान पर व्यक्तिगत सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और जेल भी गए।
हालांकि, उनके कार्यकाल को अक्सर 1975 के आपातकाल से भी जोड़कर देखा जाता है, क्योंकि उन्होंने ही तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिफारिश पर आपातकाल की घोषणा पर हस्ताक्षर किए थे।
इसके बावजूद, वे असम विधानसभा से लेकर केंद्र सरकार में कृषि और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री भी रहे थे।
विरासत-सियासत के बीच उलझा बरपेटा मेडिकल कॉलेज
असम सरकार का यह फैसला केवल एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं रह गया है, बल्कि यह पहचान और विरासत की लड़ाई बन चुका है। एक ओर सरकार का दावा है कि वह सभी मेडिकल कॉलेजों के नामकरण में एकरूपता लाना चाहती है, तो दूसरी ओर विपक्ष इसे इतिहास को फिर से लिखने की कोशिश मान रहा है।
बरपेटा के लोगों के लिए यह कॉलेज न केवल स्वास्थ्य सेवाओं का केंद्र है, बल्कि उनकी क्षेत्रीय पहचान का भी हिस्सा है। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार वाकई किसी अन्य बड़े संस्थान को पूर्व राष्ट्रपति के नाम पर समर्पित कर इस विवाद को शांत कर पाती है, या यह मुद्दा आने वाले चुनावों में एक बड़ा चुनावी हथियार बनेगा।













