, देहरादून: देश और दुनिया भर में प्लास्टिक रोजमर्रा की जरूरतों में शामिल हो चुका है. इसने इंसानों के लिए कई मायनों में सुविधाएं बढ़ाई है, लेकिन इसके बढ़ते उपयोग के कारण इसके दुष्प्रभाव भी दिखाई देने लगे हैं. चिंता की बात यह है कि अपनी सुविधा बढ़ाने के चक्कर में इंसानों ने खुद को तो मुसीबत में डाल ही लिया है, साथ ही इंसानों की लापरवाही का हर्जाना वन्यजीवों को भी भुगतना पड़ रहा है. यह स्थिति तब वन महकमे के सामने आई है, जब राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में वन्यजीवों के पोस्टमार्टम के दौरान उनके शरीर से प्लास्टिक मिल रहा है.
संरक्षित क्षेत्र तक पहुंच से बढ़ रही परेशानी: राज्य के संरक्षित क्षेत्र तक भी प्लास्टिक के पहुंचने से वन्यजीवों की परेशानी बढ़ती हुई दिखाई दे रही है. इसके पीछे की वजह वन क्षेत्र से गुजरने वाले तमाम रेलवे ट्रैक और रोड कनेक्टिविटी को माना जा रहा है. दरअसल राज्य में ऐसे संरक्षित क्षेत्र भी है, जहां से या तो रेलवे ट्रैक गुजर रहे हैं या फिर आम लोगों की सुविधा के लिए रोड कनेक्टिविटी दी गई है. देखा जा रहा है कि रेलवे ट्रैक होने के कारण अक्सर सफर के दौरान लोग ट्रेन से वन क्षेत्र में ही प्लास्टिक को फेंक रहे हैं. इसके अलावा कुछ जगहों पर जंगलों के बीच से गुजरने वाली सड़कों में लोगों की गतिविधियों के दौरान भी इसी तरह प्लास्टिक जंगलों के आसपास पहुंच रहा है.
विकराल होती जा रही प्लास्टिक वेस्ट की समस्या (
वन्यजीवों के शरीर में मिल रहे प्लास्टिक से जिम्मेदार भी हैरान: वन क्षेत्रों में वन्यजीवों की मृत्यु के बाद उनका पोस्टमार्टम किया जाता है. इसी तरह रेलवे ट्रैक की चपेट में आने वाले हाथी, सांभर या दूसरे वन्यजीवों का पोस्टमार्टम करने के बाद ही उनके शरीर को डिस्पोज किया जाता है. वन विभाग में वन्यजीवों के उपचार और उनकी चिकित्सा सुविधा के लिए काम कर रहे पशु चिकित्सकों को इस दौरान वन्यजीवों के शरीर से पॉलिथीन या प्लास्टिक मिल रहा है.
जंगलों में प्लास्टिक वेस्ट वन्यजीवों के लिए बन रहा अभिशाप (
पोस्टमार्टम के दौरान उन्हें भी वन्यजीवों के शरीर में प्लास्टिक मिला है जो चिंता की बात है. वन्यजीव द्वारा प्लास्टिक को खाद्य पदार्थ के साथ निगला जा रहा है, जिससे उनके शरीर पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है. यहां तक की ऐसी स्थिति में वन्यजीव की मृत्यु भी हो सकती है.
डॉ. राकेश नौटियाल, पशु चिकित्सक, राजाजी टाइगर रिजर्व
रेलवे के साथ मिलकर ऐसी स्थिति से निपटने का प्रयास: वन क्षेत्रों में प्लास्टिक पहुंचने के पीछे एक वजह रेलवे ट्रैक पर संरक्षित क्षेत्र के बीच में ही लोगों का प्लास्टिक के साथ खाद्य पदार्थ फेंकना भी है. ऐसी स्थिति में वन विभाग के कर्मचारियों को रेलवे ट्रैक क्षेत्र में निरंतर साफ सफाई करने के निर्देश भी दिए जाते रहे हैं. लेकिन इससे बाद भी यह समस्या बढ़ती दिख रही है.
प्लास्टिक वेस्ट खाते वन्यजीव (
इस गंभीर समस्या को लेकर वह लगातार अधिकारियों से बात करते रहे हैं और इस मामले में रेलवे विभाग के अधिकारियों से भी बात करते हुए ऐसी स्थितियों से निपटने की कोशिश की जा रही है. यह दिक्कत गढ़वाल में तमाम जगहों से लेकर कुमाऊं तक के क्षेत्र में भी महसूस की जा रही है. इसके लिए विशेष प्रयास की जरूरत भी महसूस हो रही है.
सुबोध उनियाल, वन मंत्री
सुगंध से आकर्षित हो रहे जंगलों में वन्यजीव: लोग जो खाद्य पदार्थ प्लास्टिक के साथ जंगलों में फेंक देते हैं. उसकी सुगंध वन्यजीवों को आकर्षित कर रही है. दूर से ही वन्यजीव इसकी सुगंध को महसूस करते हुए वहां तक पहुंच जाते हैं और उसके बाद खाद्य पदार्थ को प्लास्टिक के साथ ही निगल जाते हैं. इस तरह खाद्य पदार्थ की सुगंध के कारण वन्यजीव प्लास्टिक को भी निगलने से परहेज नहीं कर रहे.
वन्यजीवों के पेट से निकल रहा प्लास्टिक वेस्ट (
वन्यजीवों की भी गतिविधियां हो रही प्रभावित: जिस तरह वन क्षेत्र या इसके आसपास इंसानों द्वारा खाद्य पदार्थ फेंका जा रहा है, उसे जंगलों में वन्यजीवों की गतिविधियां भी प्रभावित हो रही हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि एक तरफ खाद्य पदार्थ की सुगंध पाकर तमाम वन्यजीव जंगलों के बाहर या आसपास पहुंच रहे हैं तो वहीं इन वन्यजीवों को खाने वाले शिकारी वन्यजीव भी इनके पीछे जंगलों से बाहर निकल रहे हैं. इस तरह देखा जाए तो इंसानों की यह लापरवाही वन्यजीवों की गतिविधियों को भी प्रभावित कर रही है और उन्हें प्लास्टिक के दुष्प्रभावों की तरफ भी धकेल रही है.
प्लास्टिक वेस्ट को निगल रहे वन्यजीव (
वेस्ट डिस्पोजल एक बहुत बड़ी समस्या है. जिसके लिए वन विभाग जन जागरूकता भी कर रहा है. इसके अलावा रेलवे विभाग के साथ मिलकर भी इस पर काम किया जा रहा है. दिक्कत यह होती है कि जो वन्यजीव वेस्ट डिस्पोजल को खाने के लिए जंगलों से बाहर निकलते हैं. उनके पीछे शिकारी जीव भी पहुंच रहे हैं. इस तरह देखा जाए तो वन क्षेत्र में वन्यजीवों के लिए वेस्ट डिस्पोजल एक गंभीर समस्या है.
आरके मिश्रा, पीसीसीएफ वाइल्डलाइफ, वन विभाग
मानव वन्यजीव संघर्ष की बढ़ रही घटनाएं: वनों के आसपास रहने वाले लोग भी जंगलों के किनारे घर का कचरा और खाद्य पदार्थ फेंक रहे हैं और इसके कारण कई जगहों पर तमाम वन्यजीवों के साथ भालू जैसा शिकारी वन्यजीव भी इस कचरे की तरफ खींचा आ रहा है. इसके अलावा हिरण, सांभर जैसे वन्यजीव भी जंगलों के बाहर निकल रहे हैं और उनके पीछे तेंदुआ और बाघ भी इंसानी बस्तियों की तरफ बढ़ रहे हैं. इंसानों की यही आदत मानव वन्यजीव संघर्ष के लिए भी बड़ा कारण बन रही है.













