नई दिल्ली:– सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को लहसुन और प्याज को लेकर दायर एक अजीब जनहित याचिका (PIL) पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए उसे खारिज कर दिया। याचिका में अदालत से एक कमेटी बनाकर यह रिसर्च कराने की मांग की गई थी कि प्याज और लहसुन में ‘तामसिक’ या नकारात्मक तत्व होते हैं या नहीं।
इस पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने याचिका की ड्राफ्टिंग और प्रकृति पर सवाल उठाते हुए तीखी टिप्पणी की और कहा, “आधी रात को ये सब याचिकाएं ड्राफ्ट करते हो क्या?” कोर्ट ने कहा कि ऐसी याचिकाएं बिना ठोस आधार के दायर की जाती हैं और इससे न्यायालय का कीमती समय बर्बाद होता है।
याचिकाकर्ता वकील ने दलील दी कि जैन समुदाय प्याज, लहसुन और जड़ वाली सब्जियों को तामसिक भोजन मानकर उनसे परहेज करता है और इस विषय पर स्पष्टता लाने के लिए शोध की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि हाल ही में गुजरात हाईकोर्ट में एक तलाक का मामला सामने आया था, जिसमें भोजन में प्याज होने को लेकर विवाद हुआ था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि आप इस तरह की याचिका दाखिल कर जैन समुदाय की भावनाओं को क्यों ठेस पहुंचाना चाहते हैं।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि उसी वकील ने तीन अन्य जनहित याचिकाएं भी दायर की थीं। इनमें शराब और तंबाकू उत्पादों में कथित हानिकारक तत्वों को नियंत्रित करने के निर्देश की मांग, संपत्तियों का अनिवार्य पंजीकरण सुनिश्चित कराने की मांग और शास्त्रीय भाषाओं की घोषणा से जुड़े दिशानिर्देश बनाने की मांग शामिल थी। सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी याचिकाओं को भी सुनने से इनकार करते हुए खारिज कर दिया।
पीठ ने कहा कि इन याचिकाओं की भाषा और ड्राफ्टिंग बेहद खराब है और इनमें मांगी गई राहत भी स्पष्ट नहीं है। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह “नॉन-एप्लिकेशन ऑफ माइंड” यानी बिना ठीक से विचार किए याचिका दायर करने का उदाहरण है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर याचिकाकर्ता वकील नहीं होते तो उन पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता था।
सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि भविष्य में इस तरह की तुच्छ और अस्पष्ट याचिकाएं दायर की गईं तो सख्त कार्रवाई की जा सकती है और भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता है। अदालत ने कहा कि इस तरह की याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट पर अनावश्यक बोझ डालती हैं और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं।












