नैनीताल: ग्लोबल वार्मिंग का असर अब साफ तौर पर हिमालयी क्षेत्रों में दिखने लगा है. उत्तराखंड समेत तमाम हिमालयी राज्यों में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जो भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं. सबसे बड़ी चिंता की बात ये है कि हिमालय में मौजूद ग्लेशियर हर साल औसतन 18 से 19 मीटर तक खिसक रहे हैं. ये स्टडी एक रिसर्च में सामने आई है.हिमालयी क्षेत्रों में ग्लोबल वार्मिंग का क्या असर पड़ रहा है, इसको लेकर नैनीताल स्थित एरीज (आर्य भट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज) के वैज्ञानिकों ने काफी अध्ययन किया.
वैज्ञानिकों के अध्ययन में सामने आया है कि हिमालयी क्षेत्र में करीब 35,000 वर्ग किलोमीटर में ग्लेशियर मौजूद हैं. इनमें 9,500 बड़े और हजारों छोटे ग्लेशियर हैं.उत्तराखंड में एक हजार से ज्यादा ग्लेशियर मौजूद: अकेले उत्तराखंड की बात करें तो यहां पर 900 बड़े और 300 छोटे ग्लेशियर स्थित हैं. तेजी से बढ़ते तापमान के कारण ये ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं और अपनी जगह छोड़ रहे हैं. एरीज के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. नरेंद्र सिंह बताते हैं कि पिछले कुछ सालों से हिमालय में सर्दियों का न्यूनतम और अधिकतम तापमान बढ़ रहा है, जिस वजह से हिमालय के ग्लेशियर भी लगातार पिघल रहे हैं.हिमालय का इको सिस्टम बेहद संवेदनशील: वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. नरेंद्र सिंह के अनुसार, हिमालय को तीसरे ध्रुव (पोल) के रूप में माना जाता है. हिमालय का इको सिस्टम बेहद संवेदनशील है और हिमालय की संरचना भी लगभग 40 मिलियन साल पुरानी है. एरीज ने वैज्ञानिकों ने हिमालय में मौजूद 20 से 25 मुख्य ग्लेशियरों का अध्ययन किया. इसके साथ ही पिछले 57 सालों के डाटा की भी स्टडी की गई.
क्लाइमेट चेंज का असर हर जगह हो रहा है, जाहे नार्थ पोल हो या फिर साउथ पोल. हिमालय को हम थर्ड पोल कहते हैं. हिमालय का इको सिस्टम काफी सेंसिटिव है. हमने 57 साल पुराना डेटा लेकर हिमालय के मुख्य 20 से 25 ग्लेशियरों का अध्ययन किया था. अध्ययन के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे कि हिमालय में मौजूद ग्लेशियर औसतन हर साल 18 से 20 मीटर पीछे खिसक रहे हैं.-डॉ नरेंद्र सिंह, वैज्ञानिक, एरीज-संकट में नदियों का अस्तिव: एरीज की स्टडी में सामने आया है कि हिमालय में मौजूद ग्लेशियर हर साल औसतन 18 से 19 मीटर पीछे खिसक रहे हैं. वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. नरेंद्र सिंह की मानें तो जिस तरह से ग्लेशियर पिघल रहे हैं, वो भविष्य के लिए अच्छा नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि हमारी अधिकतर नदियां ग्लेशियर के ऊपर ही निर्भर ही हैं. यदि इस तरह ग्लेशियर पिघलते रहे तो एक दिन नदियों का अस्तिव समाप्त हो जाएगा और पानी का बड़ा संकट खड़ा हो सकता है.ग्लेशियर के पिघलने की वजह:हिमालय में मौजूद ग्लेशियरों के पिघलने की वजह Global Warming और पहाड़ों पर बढ़ता प्रदूषण है.
हिमालय में बर्फ का समय से न पड़ना, उसके इको सिस्टम को प्रभावित कर रहा है. कुछ समय पहले इस तरह के वीडियो भी सामने आए थे, जब हिमालय की चोटियां काली पड़ गई थीं, यानी वहां नाममात्र की भी बर्फ नहीं थी. ऐसे में लोगों को पर्यावरण संरक्षण और हिमालय को बचाने के प्रति काम करना चाहिए.- डॉ नरेंद्र सिंह, वरिष्ठ वैज्ञानिक, एरीज-क्या है ARIES (एरीज): बता दें कि आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (ARIES) उत्तराखंड के नैनीताल में मौजूद है. ARIES भारत के शोध संस्था है, जो खंगोल विज्ञान, सौर भौतिकी, खगोली भौतिकी और वायुमंडलीय विज्ञान में विशेषज्ञता रखता है.













