जांजगीर चांपा: छत्तीसगढ़ में एक ऐसा गांव है, जहां के बुजुर्गों की दूरदर्शिता और जल संरक्षण के लिए किए गए काम से आज पूरा गांव खुशहाल है. जांजगीर चाम्पा जिला मुख्यालय से महज 4 किलोमीटर की दूरी पर यह गांव है. इस गांव का नाम खोखरा है. यहां 65 तालाब, निस्तारी और खेती के लिए उपयोगी साबित हो रहे हैं.
गांव में तालाब निभाते अहम भूमिका: पुराने समय में लोगों की पानी की पूर्ति के लिए तालाब और कुआं ही सबसे उचित माध्यम हुआ करते थे. वक्त के साथ पानी का संसाधन भी बढ़ता गया. भू जल के दोहन से जल स्तर गिरने लगा, लेकिन जांजगीर चाम्पा जिला के खोखरा गांव में आज भी तालाबों को संरक्षित रखा गया है, जिसकी वजह से यहां भूजल स्तर भी अच्छा है. ग्रामीण कहते हैं तालाब कब से खुदा है, इसकी जानकारी तो नहीं है, लेकिन अपने गांव के छोटे बड़े 65 तालाब खुदवाने वालों पर गर्व करते हैं.
जांजगीर चांपा में तालाबों का गांव ।छोटे बड़े मिलाकर 65 तालाब हैं. हमें नहीं पता कब ये तालाब बने हैं. तालाब के पानी का उपयोग निस्तारी, खेती के लिए किया जाता है. तालाब पहले आकाशीय जल से ही भर जाता था. साल 1972 में नहर बनी. अब नहर के पानी से तालाब भर जाता है. पानी की हमारे गांव में कोई तकलीफ नहीं है-अवधेश राठौर, स्थानीय निवासी
खोखरा गांव प्रसिद्ध मनका दाई मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है. यहां के 65 तालाब गांव की पहचान बन गए हैं. तालाबों का बाकायदा नाम करण भी किया गया है, जिसमें लंकेटर तालाब, बूटरी तालाब, मनका दाई तालाब प्रमुख हैं.तालाब का नामकरण भी किया गया है. इसके पीछे भी कहानी है. जैसे गोल घेरा तालाब को डोंगिया, कोई चौड़ा है तो बूटरी तालाब नाम पड़ा. हर तालाब के नाम के पीछे किस्सा, कहानी है- अनुभव तिवारी, तालाबों के जानकारकैसे पड़ा तालाब का नाम?: गांव के निवासी अवधेश राठौर भी तालाब के नामकरण को लेकर कहते हैं कि हमने बुजुर्गों से सुना है कि कांता तालाब को कांता साव ने खुदवाया था, इसलिए उनके नाम से तालाब का नामकरण हुआ. पटिया साव ने तालाब खुदवाया था, इसलिए तालाब का नाम पटिया तालाब पड़ा. ऐसे ही अन्य तालाबों से जुड़ी कहानियां हैं
.गांव का जलस्तर कभी नहीं सूखता: गांव के लोग बताते हैं कि प्राचीन काल में सभी तालाब वर्षा के जल से भर जाता था और तालाब का पानी पीने के साथ निस्तारी के अलावा खेती किसानी के लिए भी उपयोग में लाया जाता था. अब ग्रामीण वर्षा के जल के साथ साथ नहर से आने वाले पानी से तालाब भरते हैं, जिसके कारण गांव का जल स्तर कभी नीचे नहीं जाता.वर्तमान समय में नहरों के जरिए पानी पहुंच रहा है. आज भी जल जीवनदायिनी है और लोग नहाने के लिए उसका इस्तेमाल करते हैं-अनुभव तिवारी, तालाबों के जानकारछोटे बड़े मिलाकर 65 तालाब हैं. हमें नहीं पता कब ये तालाब बने हैं. तालाब के पानी का उपयोग निस्तारी, खेती के लिए किया जाता है. तालाब पहले आकाशीय जल से ही भर जाता था. साल 1972 में नहर बनी. अब नहर के पानी से तालाब भर जाता है. पानी की हमारे गांव में कोई तकलीफ नहीं है- अवधेश राठौर, स्थानीय निवासी
तालाब बनाने का उद्देश्य: ग्रामीण बताते हैं कि गांव में तालाब खुदवाने का मतलब सिर्फ पानी रोकना नहीं बल्कि मजदूर वर्ग को काम देने और उनकी सहभागिता और पलायन रोकना भी होता था.हमारे गांव खोखरा में 65 तालाब हैं. तालाब सिर्फ निस्तारी के लिए इस्तेमाल नहीं होते हैं, बल्कि यह हमारी संस्कृति और परंपरा से जुड़े हैं. तालाब के माध्यम से रोज़गार की व्यवस्था भी की जाती थी. कई तालाब में मछली पालन भी किया जाता है-अनुभव तिवारी, तालाबों के जानकार
तालाब की शादी: ग्रामीण बताते हैं कि तालाब खुदाई के बाद तालाब की शादी कराई जाती थी, जिसमें विधि विधान के साथ विवाह कार्यक्रम के बाद तालाब के अंदर खम्भा लगाया जाता था. इसका मतलब पीने योग्य पानी होता था और उस तालाब को लोग प्रदूषित नहीं करते थे.ग्रामीण बताते हैं कि बुजुर्ग तालाब के संरक्षण के लिए इसे धार्मिक आस्था के साथ जोड़ कर रखते थे. जिसके कारण इन तालाबों का पानी हमेशा शुद्ध और स्वच्छ रहता है.तालाब का विधिवत ब्याह किया जाता था. तीर्थों का जल डाला जाता था. कोई गंदगी नहीं करते थे. मनका दाई तालाब में निस्तारी पर पूरी तरह प्रतिबंध है-अवधेश ठाकुर, स्थानीय निवासी
ग्रामीणों का संकल्प: अनुभव तिवारी कहते हैं कि”जल को बचाने के लिए तालाबों के अस्तित्व को बचना जरुरी है. हम तालाबों को बचाने के लिए प्रयासरत हैं. तालाब हमारी विरासत की देन है.” खोखरा के लोग आज भी तालाबों को प्रदूषित होने से बचाने के लिए जुटे हैं, ताकि उनकी तालाबों वाले गांव की पहचान बनी रहे और गांव में कभी जलसंकट न आए.













