नई दिल्ली:– एआई इंपैक्ट समिट 2026 के दौरान फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक अहम सुझाव दिया — 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध। फ्रांस में ऐसे कानून की तैयारी चल रही है और स्पेन भी इस पहल के साथ है। मैक्रों का मानना है कि बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर G7 देशों को प्राथमिकता देनी चाहिए और भारत जैसे बड़े लोकतंत्र को भी इसमें शामिल होना चाहिए। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या भारत इस मॉडल को अपनाएगा?
बैन के पक्ष में तर्क
आज सोशल मीडिया बच्चों के लिए दोधारी तलवार बन चुका है। इंस्टाग्राम, X, टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म पर हिंसक, भ्रामक और आपत्तिजनक कंटेंट की भरमार है। UNICEF की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 10-19 आयु वर्ग के 40% से अधिक किशोर ऑनलाइन बुलिंग का सामना करते हैं, जिससे मानसिक तनाव, अवसाद और गंभीर मामलों में आत्मघाती प्रवृत्तियां तक बढ़ती हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का मस्तिष्क विकासशील अवस्था में होता है और एल्गोरिदम आधारित कंटेंट उन्हें स्क्रीन की लत में बांध सकता है, जिससे पढ़ाई और शारीरिक गतिविधि प्रभावित होती है। ऐसे में प्रतिबंध बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा के लिए सकारात्मक कदम माना जा सकता है।
बैन के विरोध में चिंताएं
हालांकि भारत जैसे विविध और युवा-प्रधान देश में इस तरह का प्रतिबंध कई जटिल सवाल खड़े करता है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां इंटरनेट उपलब्ध है, वहां सोशल मीडिया शिक्षा और संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम भी है। यूट्यूब, ऑनलाइन ट्यूटोरियल और शैक्षणिक कंटेंट के जरिए लाखों बच्चे सीख रहे हैं। पूर्ण प्रतिबंध से वे सूचना, ऑनलाइन लर्निंग और सामाजिक संपर्क से वंचित हो सकते हैं।
इसके अलावा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) पर संभावित प्रभाव, उम्र सत्यापन (एज वेरिफिकेशन) की तकनीकी चुनौतियां और डेटा गोपनीयता के खतरे भी सामने हैं। आधार आधारित सत्यापन से प्राइवेसी जोखिम बढ़ सकते हैं। कड़े प्रतिबंध से VPN या अंडरग्राउंड ऐप्स का उपयोग भी बढ़ सकता है, जिससे नियंत्रण और मुश्किल हो जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि सख्त बैन के बजाय “रेगुलेटेड एक्सेस” अधिक व्यावहारिक समाधान हो सकता है — जैसे पैरेंटल कंट्रोल, आयु-आधारित कंटेंट फिल्टर, डिजिटल साक्षरता अभियान और स्कूल स्तर पर साइबर जागरूकता। भारत की परिवार-केंद्रित सामाजिक संरचना में अभिभावकों की भूमिका अहम हो सकती है।
मैक्रों का प्रस्ताव भारत के लिए एक विचारणीय अवसर जरूर है, लेकिन इसे लागू करना नीतिगत संतुलन और संसाधनों पर निर्भर करेगा। बच्चों की सुरक्षा और डिजिटल अधिकारों के बीच संतुलन बनाना ही असली चुनौती है।













