दंतेवाड़ा: बस्तर के विश्व प्रसिद्ध फागुन मेला की शुरुआत आज से हो गई है. 5 से 15 मार्च तक फागुन मेला लगेगा. हर दिन मां दंतेश्वरी की विशेष पूजा अर्चना होगी. खास बात यह है कि इस बार फागुन मेला में शामिल होने न सिर्फ छत्तीसगढ़ और बस्तर बल्कि ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना समेत महाराष्ट्र जैसे पड़ोसी राज्यों से भी देवी-देवता मेला में शामिल होने पहुंचे हैं.मड़ई का अर्थ: मंदिर के पुजारी विजेंद्र नाथ जिया ने बताया कि मां दंतेश्वरी की पावन धरा में मड़ई का आयोजन हो रहा है. मड़ई का अर्थ हैं मंढाना या स्थापना करना. आज कलश की स्थापना होती है. 9 दिनों तक मां दंतेश्वरी के 9 रुपों की पालकी निकलती है. विधि विधान से आरती होती है.
बस्तर में फाल्गुन मेले की शुरुआत )जल से आरती और अभिषेक: पुजारी ने बताया कि सबसे खास बात यह है कि एक कलश में जल लेकर मां दंतेश्वरी की आरती की जाती है. यह विशेषता है. यह जल, नगर में स्थित मां शीतला के सरोवर से रोज शाम के समय लाया जाता है. माई जी की पालकी का नगर भ्रमण होने के बाद इस जल से अभिषेक किया जाता है.मड़ई मेला में देवी देवता: पुजारी के मुताबिक फागुन मड़ई मेला में देवी देवताओं की संख्या हर साल बढ़ती जा रही है. बस्तर संभाग के साथ ही ओडिशा के बार्डर, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र सीमा क्षेत्र से भी देवी देवताओं के प्रतीक जैसे छत्र, छड़ी, पताका के साथ उनके पुजारी और सेवादार दंतेवाड़ा में पूरे 9 दिन तक उपस्थित रहते हैं.परंपराओं का नाट्य चित्रण: पुजारी का कहना है कि यहां कई परंपराओं का नाट्य चित्रण होता है. यह सभी रस्में देखने लायक होती हैं. यहां आखेट यानी शिकार का अभिनय किया जाता है. इस दौरान हजारों की तादाद में लोग मौजूद रहते हैं.
यहां 9 दिनों तक बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं.800 साल पुरानी परंपरा: मंदिर के पुजारी ने बताया कि बुधवार शाम 4 बजे मां दंतेश्वरी मंदिर से मदन केसरी की पहली पालकी निकाली जाएगी, जिसमें गांव-गांव से आए देवी देवता शामिल होंगे. यह पालकी नारायण मंदिर तक ले जाई जाएगी और नारायण मंदिर में माता की पूजा के बाद वापस दंतेश्वरी मंदिर लाई जाएगी. यह प्रक्रिया हर रोज पूरी की जाएगी. आखेट का कार्यक्रम मध्य रात्रि को किया जाएगा. आखेट की कई रस्म अदा कर 800 साल पुरानी परंपरा निभाई जाएगी.आखेट की रस्म क्या है: दरअसल पुरानी मान्यताओं के अनुसार करीब 800 साल पहले आखेट (शिकार) प्रचलित था. जंगली जानवर किसानों की फसलें खराब कर देते थे. ग्रामीण इस समस्या के निदान के लिए राजा महाराजा के पास गए. तब उस समय के राजा ने जानवरों का शिकार करना शुरू किया. राजा जब शिकार करते तो किसी दैवीय शक्ति की वजह से तीर लगने के बाद भी जानवर मरते नहीं थे.
इसके बाद राजा ने जानवरों के शिकार के लिए आराध्य देवी माता दंतेश्वरी की आराधना कर अनुमति ली. फिर शिकार शुरू किया गया. यह अनुमति लेने वाले दिन से ही फागुन मड़ई की शुरुआत हुई. इसके बाद धीरे धीरे स्थानीय देवी देवताओं को भी इस मड़ई में शामिल किया जाने लगा.दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी मंदिर के पुजारी विजेंद्र नाथ जिया ने बताया कि फागुन मेला आखेट (शिकार) के लिए प्रसिद्ध है. इसमें रस्में तिथि और समय के अनुसार 10 से 11 दिनों तक चलती हैं. अब शिकार का नाट्य रूपांतरण कर परंपरा निभाई जाती है.फागुन मंडई मेला में कब कौन सी रस्म5 मार्च: प्रथम पालकी ताड़ फलंगा धोनी की रस्म6 मार्च: खोर खुदनी रस्म7 मार्च: नाच मांडणी रस्म8 मार्च: लम्हामार रस्म9 मार्च: कोडरिमार रस्म10 मार्च: चितलमार रस्म11 मार्च: गंवरमार रस्म12 मार्च : बड़ा मेला रस्म13 मार्च: आंवरामार रस्म14 मार्च: रंग भंग पादुका पूजन रस्म15 मार्च: देवी देवताओं की विदाई, फागुन मंडई का समापन













