देहरादून (उत्तराखंड): पूरी दुनिया इस समय जल संकट को लेकर चिंतित है. दुनिया भर के वैज्ञानिक इसके विकल्प पर भी मंथन कर रहे हैं, लेकिन भविष्य के इस संकट को लेकर हिमालय पिछले लंबे समय से इंसानों को आगाह कर रहा है. बावजूद इसके न तो इसके समाधान की तरफ कोई कदम बढ़ाया गया है और न ही सरकारें इसपर गंभीर दिखाई दे रही है.आगाह करता हिमालय: पृथ्वी का 70 प्रतिशत हिस्सा पानी से भरा हुआ है. इसके बावजूद भी दुनिया जल संकट को लेकर बड़े खतरे की तरफ बढ़ रही है. ऐसा इसलिए क्योंकि पृथ्वी में मीठा पानी जिसे पीने या विभिन्न कार्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, उसकी मात्र केवल तीन प्रतिशत ही है, जबकि दो तिहाई हिस्सा ऐसा है, जो ग्लेशियर के रूप में मौजूद है. ग्लेशियर की बात आते ही हिमालय की चर्चा होना लाजमी है और यही हिमालय है, जो पिछले लंबे समय से दुनिया में जल संकट के खतरे को लेकर आगाह कर रहा है.
जानिए वास्तविक स्थिति: भारत में भी जल संकट एक बड़ा मुद्दा है और पानी की कमी को अक्सर देश के तमाम राज्यों में महसूस भी किया जाता रहा है. केंद्रीय जल शक्ति राज्य मंत्री द्वारा राज्यसभा में दिए गए बयान के रिकॉर्ड बताते हैं कि .साल 2021 में औसत वार्षिक प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1486 घन मीटर रही है,जबकि 2031 के लिए औसत वार्षिक प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1367 घन मीटर की गई है.इसके साथ ही 1700 घन मीटर से कम प्रति व्यक्ति वार्षिक जल की उपलब्धता को जल संकट की स्थिति में माना जाता है.वही 1000 घन मीटर से कम वार्षिक प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता को जल की कमी की स्थिति के रूप में देखा जाता है.हिमालय में दी जल संकट पर चेतावनी: पानी के संकट को लेकर सबसे पहले हिमालय ने ही इंसानों को आगाह किया. हिमालय में मौजूद ग्लेशियर का पीछे हटना इस संकट का सबसे बड़ा संदेश था. इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट की रिपोर्ट बताती है कि हिमालय में मौजूद ग्लेशियर करीब 65 प्रतिशत तेजी से पिघल रहे हैं.
उत्तराखंड में जल संकट. (।हिमालय के ये ग्लेशियर भारत ही नहीं बल्कि तमाम पड़ोसी देश के लिए भी पेयजल का एक बड़ा स्रोत है. करीब 24 करोड़ लोगों पेयजल और सिंचाई का पानी इन्हीं ग्लेशियर से निकलने वाली नदियों से मिलता है. लेकिन ग्लेशियर के तेजी से पिघलने के साथ ही नया संकट पानी की कमी को लेकर होगा और नदियों में भी इसका असर दिखाई देगा. प्रोफेसर एसपी सती बताते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण आज ग्लेशियर पिघल रहे हैं और बदलते मौसम के कारण एवलांच जैसी घटनाएं भी हो रही है. यह स्थितियां कई तरह के खतरों की वजह बन रही है.
ग्लेशिलय तेज से पिघल रहे है, जो भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं है. ग्लोबल वार्मिंग ने बदला मौसमी चक्र: ग्लेशियर का तेजी से पिघलना और जल संकट का प्रमुख कारण ग्लोबल वार्मिंग का माना जा रहा है. दरअसल ग्लोबल वार्मिंग के कारण मौसमीय चक्र बदल रहा है और इससे जिन ऊंचे स्थानों पर बर्फबारी देखी जाती थी, वहां पर बारिश ही मिल पा रही है. इसी तरह पृथ्वी का तापमान बढ़ने के कारण भी हिमालय प्रभावित हो रहा है. और यह प्रभाव ग्लेशियर से होते हुए नदियों के जलस्तर पर दिखाई देने लगा है, जिससे पीने के पानी का संकट भविष्य में खड़ा होता हुआ महसूस हो रहा है.
इंसानों ने भी पानी को खूब बर्बाद किया: डीएवी महाविद्यालय में ज्योग्राफी की HOD प्रो संगीता भट्ट कहती कि वैसे तो जल संकट के पीछे की वजह ग्लोबल वार्मिंग है और इससे भविष्य के खतरे का आभास भी हो रहा है. लेकिन इंसानों का बदलता रहन-सहन और आधुनिकता ने भी पानी की बर्बादी को बढ़ाया है.प्रो संगीता भट्ट कहना है कि इस वक्त इंसानों को आगाह होने की जरूरत है. पानी की बर्बादी को न किया जाए, इसके लिए प्रयास होने बेहद जरूरी है. हालांकि अब बदलते रहना-सहना में ऐसा होना संभव नहीं दिखाई देता है.
हिमालय दुनिया में बर्फ का तीसरा बड़ा भंडार: हिमालय पर्वत श्रृंखला अंटार्कटिका और आर्कटिक के बाद दुनिया में बर्फ का तीसरा सबसे बड़ा भंडार है. हिमालय के पहाड़ों में गंगोत्री ग्लेशियर इस क्षेत्र के सबसे बड़े ग्लेशियर में से एक है, जो की गंगा नदी का स्रोत भी है.तेजी से पिघल रहे ग्लेशियर: पिछले लंबे समय से गंगोत्री ग्लेशियर के तेजी से पिघलने को लेकर कुछ शोध सामने आते रहे हैं, जिनमें भी ग्लेशियर के पिघलने की वजह ग्लोबल वार्मिंग को ही माना जाता रहा है. हालांकि ग्लेशियर पर लोगों की गतिविधियों होने के कारण भी ग्लेशियर पर इसका असर दिखाई दे रहा है. साथ ही उत्तराखंड में बड़ी संख्या में जंगलों की आग भी ग्लेशियर के पिघलने की वजह बनी हुई है.शोधकर्ता मानते हैं कि हिमालय में करीब 600 से ज्यादा ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जबकि 2010 के बाद इन ग्लेशियर के पिघलने की रफ्तार भी काफी तेज हुई है. ग्लेशियर पर झीलों का बना भी इसकी ही एक वजह है और इसके कारण केदारनाथ जैसी घटनाएं भी देखने को मिल रही हैं.
उत्तराखंड में भी जल संकट की दिखाई देती रही है स्थिति: उत्तराखंड में जल संकट का प्रभाव सीधे तौर पर दिखाई देता रहा है,प्रदेश में करीब 477 जल स्रोत सूखने की स्थिति पर दिखाई देते हैं.उत्तराखंड में करीब 288 स्रोत ऐसे हैं, जो 50% से अधिक सूख चुके हैं.इसी तरह करीब 40 स्तोत्र 75% तक सूख चुके हैं.राज्य में पिछले रिकार्ड बताते हैं कि बारिश की मात्रा में भी कमी देखी जा रही है और कुछ महीने तो पूरी तरह ड्राई जा रहे हैं. गर्मियों के समय में उत्तराखंड में जल संकट की स्थिति स्पष्ट तौर पर लोगों के लिए परेशानी बन रही है. स्थिति यह है की राजधानी देहरादून से लेकर पहाड़ी जिलों तक में भी पानी के टैंकर से लोगों की प्यास बुझानी पड़ रही है.













