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पाली परियोजना में पोषण आहार के नाम पर बड़ा खेल बच्चों के हिस्से के रेडी टू ईट पर कमीशन के गंभीर आरोप…

NBTV24 by NBTV24
August 19, 2026
in छत्तीसगढ़
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पाली परियोजना में पोषण आहार के नाम पर बड़ा खेल बच्चों के हिस्से के रेडी टू ईट पर कमीशन के गंभीर आरोप…
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छत्तीसगढ़:– महिला एवं बाल विकास विभाग की पाली परियोजना में बच्चों, गर्भवती महिलाओं, शिशुवती माताओं और किशोरी बालिकाओं के लिए संचालित पूरक पोषण आहार योजना अब गंभीर सवालों के घेरे में है। परियोजना के अंतर्गत पोड़ी, सिल्ली, लाफा, माखनपुर, सपलवा सहित कई सेक्टरों की आंगनबाड़ियों में बीते सप्ताह मंगलवार को रेडी टू ईट पोषण आहार की आपूर्ति नहीं होने का मामला सामने आया था। इसके चलते बड़ी संख्या में हितग्राहियों को निर्धारित पोषण आहार नहीं मिलने की बात सामने आई। मामला उजागर होने और खबरें प्रसारित होने के बाद कथित तौर पर रेडी टू ईट संचालनकर्ता प्रगति स्व सहायता समूह द्वारा संबंधित सेक्टरों में आनन-फानन में पोषण आहार पहुंचाया गया। लेकिन अब सामने आ रहे आरोप इस पूरे मामले को महज आपूर्ति में लापरवाही से कहीं आगे ले जाते नजर आ रहे हैं।

दर्ज हितग्राही कुछ और, वितरण कुछ और होने का आरोप
विभागीय सूत्रों से सामने आई जानकारी के अनुसार आरोप है कि कुछ सेक्टरों में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से दर्ज हितग्राहियों की संख्या के अनुपात में पूरा रेडी टू ईट उपलब्ध कराने के बजाय कम मात्रा में पोषण आहार लेने और शेष पैकेटों को कथित तौर पर बाजार में खपाने अथवा वापस करने का खेल चल रहा है। सूत्रों का दावा है कि कुछ स्थानों पर बच्चों एवं अन्य हितग्राहियों की दर्ज संख्या के मुकाबले लगभग आधा या उससे भी कम रेडी टू ईट वितरित किया जाता है और शेष मात्रा पर कथित तौर पर प्रति पैकेट 10 रुपये कमीशन देने की बात सामने आई है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है और निष्पक्ष जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

एक पैकेट की लागत से लाखों के भुगतान तक—हिसाब होना जरूरी
सूत्रों के अनुसार लगभग 812.50 ग्राम के एक रेडी टू ईट पैकेट को तैयार करने में करीब 40 से 50 रुपये तक का खर्च बताया जा रहा है। वहीं पाली परियोजना के अंतर्गत कुल 14 सेक्टरों में बड़ी संख्या में आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं और हजारों हितग्राही दर्ज हैं। सूत्रों के मुताबिक रेडी टू ईट के लिए संबंधित समूह को हर महीने लगभग 20 से 22 लाख रुपये का भुगतान किया जाता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि शासन से जिन हितग्राहियों के नाम पर भुगतान किया जा रहा है, क्या उतनी ही मात्रा में पोषण आहार वास्तव में हितग्राहियों तक पहुंच रहा है? यदि नहीं, तो भुगतान, उत्पादन, उठाव, परिवहन, स्टॉक और वितरण का पूरा हिसाब सार्वजनिक जांच के दायरे में क्यों नहीं लाया जाना चाहिए?

परियोजना अधिकारी और सेक्टर सुपरवाइजर की निगरानी पर सवाल
इस पूरे मामले में केवल रेडी टू ईट आपूर्तिकर्ता समूह की भूमिका ही सवालों के घेरे में नहीं है, बल्कि विभाग की निगरानी व्यवस्था भी कटघरे में खड़ी है। आखिर आंगनबाड़ी केंद्रों में स्टॉक कितना पहुंचा, कितना वितरित हुआ और कितना शेष रहा—इसकी नियमित निगरानी किस स्तर पर हुई? यदि निर्धारित मात्रा में पोषण आहार लंबे समय से वितरित नहीं किया जा रहा था तो स्टॉक रजिस्टर, वितरण पंजी, हितग्राही संख्या और वास्तविक वितरण के बीच अंतर विभागीय अधिकारियों और पर्यवेक्षकों की नजर में क्यों नहीं आया? सूत्रों द्वारा परियोजना अधिकारी से लेकर सेक्टर सुपरवाइजर और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं तक की कथित मिलीभगत के आरोप लगाए जा रहे हैं, जिनकी स्वतंत्र जांच बेहद जरूरी है।

क्या कागजों में पूरा वितरण और जमीन पर आधा?

इस मामले की वास्तविक तस्वीर सामने लाने के लिए पिछले कई महीनों के रिकॉर्ड की आंगनबाड़ीवार जांच जरूरी है। प्रत्येक केंद्र पर दर्ज हितग्राहियों की संख्या, उनके नाम पर स्वीकृत रेडी टू ईट की मात्रा, समूह द्वारा तैयार की गई मात्रा, केंद्र तक पहुंचाई गई मात्रा, स्टॉक रजिस्टर में दर्ज मात्रा और वास्तविक हितग्राही वितरण का मिलान किया जाना चाहिए। साथ ही बची हुई सामग्री कहां गई और उसका रिकॉर्ड क्या है, इसकी भी जांच होनी चाहिए। यदि कागजों में पूरा वितरण दर्ज है लेकिन भौतिक सत्यापन में मात्रा कम मिलती है, तो मामला साधारण लापरवाही का नहीं बल्कि गंभीर वित्तीय एवं प्रशासनिक अनियमितता का बन सकता है।

बच्चों के निवाले पर कमीशन का आरोप—जांच में सामने आए सच

जिस योजना का मूल उद्देश्य कुपोषण से लड़ना और जरूरतमंद बच्चों तथा महिलाओं को अतिरिक्त पोषण उपलब्ध कराना है, उसी योजना में यदि कमीशनखोरी के आरोप सही साबित होते हैं तो यह बेहद गंभीर स्थिति होगी। सरकार लाखों रुपये खर्च कर रही है ताकि आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से वास्तविक हितग्राहियों तक पोषण पहुंचे। ऐसे में यदि कथित तौर पर बीच में ही पैकेट कम किए जा रहे हैं और बच्चों के हिस्से के पोषण पर कमीशन तय किया जा रहा है, तो योजना का मूल उद्देश्य ही प्रभावित होगा। सवाल सीधा है—सरकारी योजना बच्चों को पोषण देने के लिए है या फिर सिस्टम से जुड़े लोगों को पोषित करने के लिए?

एक दिन की जांच नहीं, कई महीनों का हिसाब खंगालना होगा

यदि प्रशासन इस मामले की गंभीरता से जांच करना चाहता है तो केवल हाल में सामने आई आपूर्ति की कमी की जांच पर्याप्त नहीं होगी। पिछले कई महीनों के रेडी टू ईट उत्पादन, उठाव, परिवहन, सेक्टरवार आपूर्ति, आंगनबाड़ीवार स्टॉक और हितग्राहीवार वितरण का रिकॉर्ड खंगालना होगा। साथ ही बिना पूर्व सूचना के अलग-अलग आंगनबाड़ी केंद्रों का भौतिक सत्यापन कराया जाना चाहिए। संबंधित समूह के भुगतान रिकॉर्ड और विभागीय दस्तावेजों का भी मिलान किया जाना जरूरी है। यही जांच बताएगी कि मामला महज आपूर्ति में देरी का था या इसके पीछे लंबे समय से कोई बड़ा खेल चल रहा था।
प्रशासन करे निष्पक्ष जांच, दोषी मिले तो हो कड़ी कार्रवाई

पाली परियोजना में सामने आए गंभीर आरोपों पर जिला प्रशासन और महिला एवं बाल विकास विभाग को तत्काल संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच करानी चाहिए। जांच के दायरे में संबंधित परियोजना अधिकारी, सेक्टर सुपरवाइजर, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता तथा रेडी टू ईट आपूर्तिकर्ता समूह की भूमिका को भी शामिल किया जाना चाहिए। यदि दस्तावेजी जांच और भौतिक सत्यापन में अनियमितता प्रमाणित होती है तो जिम्मेदार लोगों पर नियमानुसार कार्रवाई के साथ शासकीय राशि की वसूली भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। क्योंकि मामला सिर्फ कुछ पैकेट रेडी टू ईट का नहीं है—सवाल उन बच्चों के निवाले का है, जिनके नाम पर शासन हर महीने लाखों रुपये खर्च कर रहा है।

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