नई दिल्ली:– लगभग दो साल पहले, दिसंबर 2024 में मैंने अपने एक बैंकर मित्र के साथ शर्त लगाई: क्या यूपीआई (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) ग्रामीण भारत में नकदी का विकल्प बन सकता है? क्या यह हर चीज के लिए काम कर सकता है – किराने का सामान, भोजन, छोटे से छोटे लेनदेन? वह संशय में था। लेकिन मुझे पूरा विश्वास था कि यह संभव है।
मैंने एयरबीएनबी पर एक कमरा बुक किया और चार दिन की छुट्टी के लिए महाराष्ट्र के तटीय शहर दहाणू के लिए रवाना हो गया। मैंने जानबूझकर अपना बटुआ घर पर ही छोड़ दिया था। अपनी पूरी यात्रा के दौरान, मैंने जो भी चाहा-मछली की करी और चावल (250 रुपये), इडली-वड़ा (40 रुपये), केले (50 रुपये प्रति दर्जन), और यहां तक कि मीठा पान (10 रुपये)-सबके लिए यूपीआई ने बिना किसी रुकावट के काम किया। मैंने घर के केयरटेकर को टिप भी यूपीआई के माध्यम से ही दी। मेरा फोन ही मेरा बटुआ बन गया। हर विक्रेता, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, उसके पास एक क्यूआर कोड था।
मुझे इतना यकीन हो गया था कि मैंने एक किताब लिखने की योजना बना ली थी और उसका शीर्षक भी सोच लिया था: द क्यूआर रेवल्यूशन। मेरा बैंकर दोस्त, जो शर्त हार गया था, उसने कुछ वैकल्पिक शीर्षक भी सुझाए। लेकिन मैं उसे लिख ही नहीं पाया। पिछले हफ्ते मैंने शांतनु पॉल और बी. सांबमूर्ति (पेंगुइन रैंडम हाउस) द्वारा लिखित ‘कैशलेस नेशन: हाउ यूपीआई चेंज्ड एवरीथिंग’ पढ़ी।
पॉल भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) के बोर्ड सदस्य थे और उसकी नवाचार परिषद के अध्यक्ष भी रहे। सांबमूर्ति इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट ऐंड रिसर्च इन बैंकिंग टेक्नॉलजी के प्रमुख थे और एनपीसीआई के अंतरिम गैर-कार्यकारी अध्यक्ष भी रहे।
इस पुस्तक में पांच खंड हैं जिनमें से प्रत्येक भारत के डिजिटल परिवर्तन के एक अलग पहलू को उजागर करता है।
पहला अध्याय इस प्रकार शुरू होता है: ‘यह 8 नवंबर, 2016 का दिन था, और यह बाकी दिनों जैसा ही लग रहा था। दीवाली को बीते हुए मुश्किल से दस दिन ही बीते थे, और भारत इसके प्रभावों से उबरने लगा था। जैसे-जैसे दिन ढलने लगा, अचानक यह चर्चा फैल गई कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज शाम राष्ट्र को संबोधित कर सकते हैं… रात 8 बजे, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय टेलीविजन पर प्रकट हुए और उन्होंने अपना गला साफ किया।’ बाकी, जैसा कि कहते हैं, इतिहास है।
इसके कुछ महीने पहले 11 अप्रैल, 2016 को, मुंबई के एक गर्म और उमस भरे दिन, ताज महल पैलेस होटल में एक नई यात्रा की शुरुआत हुई थी। यूपीआई के सॉफ्ट-लॉन्च के दौरान भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन ने कहा था, ‘देश में दुनिया की सबसे परिष्कृत सार्वजनिक भुगतान प्रणाली है।’
उससे भी कई साल पहले, 29 सितंबर, 2010 को उत्तरी महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले का तेम्भली गांव उत्सव के माहौल में जाग उठा था। नई सड़कें बनाई गई थीं, पानी की टंकी को नए सिरे से रंगा गया था, और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ, वित्तीय समावेशन की नींव रखने के लिए पहुंचे, जिससे पूरा माहौल उत्साह से भर गया था।
भाग दो, ‘लॉन्ग मार्च’, वित्तीय समावेशन की पड़ताल करता है और इंडिया बनाम भारत की बहस से परिचय कराता है।
तीसरा भाग, ‘टर्फ वार्स’, मोबाइल भुगतान के लिए दूरसंचार कंपनियों और बैंकों के बीच के टकराव का वर्णन करता है। यहीं से एनपीसीआई का उदय हुआ- संघर्ष से जन्मा, एक निष्पक्ष मंच के रूप में स्थापित।
‘क्वेस्ट ऐंड कॉन्क्वेस्ट’ का चौथा भाग यूपीआई के उदय और उसे व्यापक रूप से अपनाए जाने की कहानी बयां करता है। लेखक 1970 के दशक के नई दिल्ली में लौटते हैं, जहां एक कारोबारी अधिकारी एक आलीशान होटल के रेस्तरां में पदोन्नति का जश्न मनाता है। वह अपना डाइनर्स क्लब कार्ड दिखाकर भुगतान करने जाता है, वेटर घबरा जाता है।
मैनेजर माफी मांगता है: होटल का डाइनर्स क्लब के साथ कोई समझौता नहीं है। बिल का भुगतान नकद में किया जाता है, यह एक झटके की तरह था। वापस लौटते समय, अधिकारी को एक बोर्ड दिखाई देता है: ‘डाइनर्स क्लब कार्ड स्वीकार किए जाते हैं।’ पूरे दिल्ली में केवल एक ही दुकान था, खान मार्केट में – एक बुटीक जो विदेशी पर्यटकों को कश्मीरी कालीन बेचती है। नवाचार हमेशा बुनियादी ढांचे से पहले आता है, कभी-कभी तो दशकों पहले।
अंतिम भाग, ‘बिलियंस ऐंड बिलियंस’, शायद आगे के घटनाक्रम के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है। यह वर्तमान का गहन विश्लेषण करता है और भविष्य की ओर देखता है। लेखक जुलाई 2025 में हुई एक अनौपचारिक चर्चा का जिक्र करते हैं, जिसमें आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने स्पष्ट रूप से कहा था: इस व्यवस्था का खर्च अंततः किसी न किसी को तो उठाना ही होगा।
अब तक सरकार ने एमडीआर (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) की लागत को वहन किया है ताकि इसे तेजी से अपनाया जा सके, हालांकि हाल ही में यह आंशिक रूप से ही हो रहा है। शून्य शुल्क, पूर्ण सब्सिडी। लेकिन जैसे-जैसे व्यवस्था परिपक्व होती जाएगी, यह मॉडल टिकाऊ नहीं रह जाएगा।
आंकड़े चौंका देने वाले हैं। अगस्त में, यूपीआई ने 24.51 अरब मासिक लेनदेन संसाधित किए, जिनकी कुल राशि लगभग 29.82 लाख करोड़ रुपये थी। दैनिक लेनदेन की औसत संख्या 79.1 करोड़ और मूल्य लगभग 96,205 करोड़ रुपये रहा। यानी प्रति सेकंड लगभग 9,000 लेनदेन, जो विश्वसनीय रूप से संसाधित किए गए। यूपीआई का उपयोग करने वाले कई लोग अपने जीवन में पहली बार लेनदेन कर रहे हैं।
पुस्तक का अंतिम निष्कर्ष विचारणीय है: मुद्रा की अवधारणा ही बदल रही है। डिजिटल मुद्रा धीरे-धीरे सॉफ्टवेयर की तरह व्यवहार करने लगी है। यह अब निष्क्रिय होकर खातों में पड़ी नहीं रहती।
निकट भविष्य में, आपकी मुद्रा ‘स्मार्ट’ और ‘सक्रिय’ हो सकती है, जो आपकी प्राथमिकताओं को समझकर, आपके बिलों का स्वचालित भुगतान करके, आपके लाभ को अधिकतम करके और आपके जोखिमों का प्रबंधन करके, बिना आपके किसी हस्तक्षेप के यह सब कर सकती है। कैशलेस नेशन का यही भविष्य है जिसकी कल्पना की गई है










