नई दिल्ली:– धार्मिक-आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टि से सावन महीना बेहद शुभ माना जाता है। भगवान शिव को समर्पित इस महीने में शिवभक्त शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और भांग आदि अर्पित कर महादेव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। लेकिन क्या आपने कभी ऐसे शिव मंदिर के बारे में सुना है, जहां भक्त भगवान भोलेनाथ को जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा न चढ़ा कर बल्कि जिंदा केकड़ा चढ़ाते हैं? सुनने में यह परंपरा भले ही हैरान करने वाली लगे, लेकिन गुजरात के एक प्रसिद्ध शिव मंदिर में इसे आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जाता है।
यह अनोखा शिव मंदिर कहां है? जानिए
आपको जानकारी के लिए बता दें , यह अनोखा शिव मंदिर गुजरात के सूरत जिले में स्थित हैं। जहां रामनाथ घेला महादेव मंदिर में निभाई जाती है। समुद्र किनारे स्थित यह प्राचीन शिव मंदिर अपनी विशेष धार्मिक मान्यता के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। खासतौर पर मकर संक्रांति के अवसर पर यहां हजारों श्रद्धालु दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं।
ये खास लोग आते है यहां
स्थानीय लोगों के अनुसार, जिन लोगों को कान दर्द, कान में संक्रमण या अन्य समस्याएं होती हैं, वे भगवान शिव से प्रार्थना करते हैं। मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु मंदिर में आकर जिंदा केकड़ा अर्पित करते हैं।
भक्तों का विश्वास है कि भगवान भोलेनाथ की कृपा से उन्हें राहत मिलती है। हालांकि, इस मान्यता का कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। यह पूरी तरह स्थानीय आस्था और धार्मिक विश्वास पर आधारित परंपरा है।
क्या है इस मंदिर से जुड़ी मान्यता?
स्थानीय लोगों के अनुसार, वनवास के दौरान भगवान श्रीराम इस स्थान पर पहुंचे थे। उन्होंने यहां भगवान शिव की आराधना की और शिवलिंग की स्थापना की। तभी से यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन गया। बताया जाता है कि, समय के साथ यहां जिंदा केकड़ा चढ़ाने की परंपरा भी शुरू हुई, जिसे आज भी भक्त पूरी श्रद्धा के साथ शिवभक्त निभाते है।
कैसे होती है यह पूजा?
श्रद्धालु पूजा की थाली में फूल, बेलपत्र, जल और जिंदा केकड़ा लेकर मंदिर पहुंचते हैं। विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करने के बाद केकड़ा अर्पित किया जाता है। पूजा संपन्न होने के बाद स्थानीय परंपरा के अनुसार केकड़ों को नुकसान नहीं पहुंचाया जाता, बल्कि उन्हें दोबारा समुद्र में छोड़ दिया जाता है।
देशभर में भगवान शिव के हजारों मंदिर हैं, लेकिन जिंदा केकड़ा चढ़ाने की परंपरा इस मंदिर को एक अलग पहचान देती है। समुद्र के किनारे स्थित यह मंदिर अपनी अनोखी मान्यता, धार्मिक इतिहास और सदियों पुरानी परंपरा के कारण हर साल हजारों श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करता है।







