नई दिल्ली:– सनातन धर्म में जीवन को एक यात्रा माना गया है। इस यात्रा का अंतिम पड़ाव मृत्यु होता है। मृत्यु के बाद व्यक्ति के लिए जो धार्मिक क्रियाएं की जाती हैं, उन्हें अंतिम संस्कार कहा जाता है। शास्त्रों में इन परंपराओं का विशेष महत्व बताया गया है।
इन्हीं परंपराओं में से एक है मृत व्यक्ति के पैरों को छूना, लेकिन अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर किसी के निधन के बाद उसके पैर क्यों छुए जाते है। क्या इसके पीछे केवल भावना है या कोई धार्मिक कारण भी है? आइए इस परंपरा के अर्थ और महत्व को समझते हैं।
क्यों छुए जाते हैं मृत व्यक्ति के पैर?
मृत व्यक्ति के पैर छूना उसके प्रति अंतिम सम्मान प्रकट करने का तरीका माना जाता है। यह एक तरह से धन्यवाद कहने जैसा होता है। जीवन में उसने जो स्नेह, मार्गदर्शन और सहयोग दिया, उसके लिए मन से आभार जताया जाता है।
सनातन परंपरा में बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया जाता है। यही भाव मृत्यु के बाद भी बना रहता है। यह दिखाता है कि संबंध केवल जीवन तक सीमित नहीं होते, बल्कि भावनाएं अंत तक जुड़ी रहती है।
अंतिम विदाई का प्रतीक
मृत व्यक्ति के पैर छूना एक तरह की अंतिम विदाई मानी जाती है। यह पल परिवार और करीबी लोगों के लिए बेहद भावुक होता है। माना जाता है कि इस समय आत्मा अपनी नई यात्रा की ओर बढ़ती है।
ऐसे में अंतिम बार चरण स्पर्श कर व्यक्ति मन ही मन शांति और आशीर्वाद की कामना करता है। इससे दिल को सुकून मिलता है और दुख को सहने की ताकत मिलती है।
परंपरा के पीछे का क्या है धार्मिक रहस्य
किसी अपने को खोना जीवन का सबसे बड़ा दुख होता है। इस दर्द को शब्दों में बयां करना आसान नहीं होता है। अंतिम संस्कार के समय किया गया यह छोटा सा कर्म मन को थोड़ी शांति देता है।
माना जाता है कि इससे सच्चाई को स्वीकार करने में मदद मिलती है। व्यक्ति अपने मन की भावनाओं को व्यक्त कर पाता है। यही वजह है कि इस परंपरा को आज भी निभाया जाता है।
सामाजिक और धार्मिक महत्व
यह परंपरा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक भी है। यह सिखाती है कि रिश्तों में सम्मान सबसे ऊपर होता है। जीवन के आखिरी क्षणों में भी यह सम्मान बना रहता है। इसी वजह से परिवार के छोटे सदस्य अपने से बड़े मृत व्यक्ति के पैर छूते है। यह भावनात्मक जुड़ाव और संस्कारों की पहचान है।













