नई दिल्ली : आज के दौर में ज्यादातर लोगों की भागदौड़ सिर्फ इसलिए ही है क्योंकि वो अपनी जिंदगी में सफल होना चाहते हैं, कुछ न कुछ हासिल करना चाहता है। सफलता की राह पर चलने के लिए सही कर्म करना तो जरूरी है ही, साथ ही मनोबल का संतुलन बनाए रखने के लिए और लक्ष्य पर फोकस बनाए रखने के लिए प्रेरणादायक चीजों को पढ़ना और सुनना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। हिन्दू शास्त्रों में ऐसी कई चीजें लिखी हुई हैं जो हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है, जो हमें लक्ष्य प्राप्ति और सफलता के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। आइए इस लेख में संस्कृत के ऐसे ही 6 श्लोकों के बारे में जानते हैं, जो हमारे मनोबल का संतुलन बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।
- विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः।
भावार्थ: सच और झूठ में भेद करने का निरंतर अभ्यास ही मोक्ष की प्राप्ति और अज्ञानता के नाश का उपाय है।
- संधिविग्रहयोस्तुल्यायां वृद्धौ संधिमुपेयात्।
भावार्थ: युद्ध या शांति दोनों में समान लाभ हो, तो राजा को शांति का ही मार्ग चुनना चाहिए। यह श्लोक हमें परिस्थिति के अनुसार लचीलापन अपनाने और शांतिपूर्ण तरीके से लक्ष्य प्राप्ति का प्रयास करने का संदेश देता है।
- सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः॥
भावार्थ: हमें जो भी दुःख होता है, वह हमारे बश में नहीं होता। दुःख हमेशा दूसरों के कारण ही प्राप्त होता है, मगर सुख प्राप्त करना हमेशा हमारे हाथ में होता है। हमारे खुद के प्रयासों से ही प्राप्त हो सकता है। दुख को प्राप्त करना, दुख मिलना हमारे हाथ में नहीं। सुख को प्राप्त हमारे हाथ में है, वह हमें दूसरों के कारण नही मिलता बल्कि स्वयं के कारण ही मिलता है। सुख-दुख के इसी लक्षण को समझ कर हमें सुख-दुख को समान भाव से ग्रहण करना चाहिए।
- अप्राप्यं नाम नेहास्ति धीरस्य व्यवसायिनः।
भावार्थ: जिस व्यक्ति में साहस और लगन है उसके लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं है।
- सिंहवत्सर्ववेगेन पतन्त्यर्थे किलार्थिनः॥
भावार्थ: जो लोग काम करना चाहते हैं, वे शेर के समान तीव्र गति से कार्य में लग जाते हैं।
- अनारम्भस्तु कार्याणां प्रथमं बुद्धिलक्षणम्।
आरब्धस्यान्तगमनं द्वितीयं बुद्धिलक्षणम्॥
भावार्थ: कार्य को शुरू न करना बुद्धि का पहला लक्षण है। आरंभ किए गए कार्य को पूरा करना बुद्धि का दूसरा लक्षण है।













