जांजगीर चांपा: देश भर में 14 मार्च को होली का त्योहार मनाया जाएगा. लेकिन जांजगीर चांपा के पंतोरा गांव में रंग पंचमी 19 मार्च को मनाई जाएगी. जांजगीर चांपा जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर कोरबा रोड पर पंतोरा गांव बसा है. होली के पांच दिनों बाद यहां पर लट्ठमार होली खेली जाती है. बरसाने की तर्ज पर यहां लट्ठमार होली का आयोजन हर साल किया जाता है. स्थानीय लोग लट्ठमार होली को स्थानीय भाषा में डंगाही होली कहते हैं.होली के पांच दिन बाद रंग पंचमी: परंपरा के मुताबिक पंतोरा गांव में लट्ठमार होली यानि कि डंगाही होली के दिन गांव की कुंवारी कन्याएं मंदिर में अभिमंत्रित बांस की छड़ियां लोगों पर बरसाती हैं. यहां के ग्रामीणों में आस्था है कि छड़ी खाने से बीमारियं से दूर हो जाती हैं. डंगाही होली का पंतोरा मे विशेष महत्व है.मड़वा रानी देवी के पहाड़ पर ले जाई जाती है बांस की छड़ी: बलौदा ब्लाक के पंतोरा गांव में विराजित मां भवानी मंदिर परिसर में रंग पंचमी के दिन हर साल पंतोरा के ग्रामीण जुटते हैं. स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यहां लट्ठमार होली की बरसों पुरानी परंपरा चली आ रही है.
रंग पंचमी के एक दिन पूर्व शाम को ग्रामीण मड़वारानी के जंगल से बांस की छड़ी लेकर आते हैं. होली के दिन उसी छड़ी को लट्ठमार होली में इस्तेमाल किया जाता है. जिस छड़ी से लट्ठमार होली खेली जाती है उसे एक ही कुल्हाड़ी से काटा जाता है.पुजारी करते हैं छड़ी की पूजा: बैगा समाज के पुजारी उस छड़ी की पहले पूजा करते हैं फिर उससे होली खेली जाती है.बांस की छड़ी की पूजा कर उसे मां भवानी के सामने भी रखा जाता है. मान्यता है कि रंग पंचमी के दिन इस छड़ी से लट्ठमार होली खेलने वाला कभी बीमार नहीं पड़ता है और जो रोग होते हैं वो दूर हो जाते हैं.आशीर्वाद समझ खाते हैं छड़ी की मार: पूजा अर्चना के बाद कुंवारी कन्याएं छड़ी को पांच बार मां की प्रतिमा से स्पर्श कराती हैं. इसके बाद मंदिर परिसर में आए लोगों पर कुंवारी कन्याएं छड़ी बरसाती हैं. लोग इसका बुरा नहीं मानते हैं और खुशी खुशी छड़ी की मार को आशीर्वाद समझ स्वीकार करते हैं. पंतोरा गांव में होने वाली ये होली पूरे छत्तीसगढ़ में प्रसिद्ध है. गांव के लोग कहते हैं कि छड़ी की मार खाकर कई गंभीर बीमारियां उनसे दूर रहती हैं.












