नई दिल्ली:– इस्लाम धर्म के सबसे पाक शह मक्का में हाल ही में एक बड़े रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इस समझौते में इस्लामिक दुनिया के तीन बड़े देश पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब शामिल हैं। इस समझौते के तहत अगर कोई भी देश पाकिस्तान, सऊदी अरब या तुर्की में से एक पर भी हमला करता है, तो दूसरा देश उसकी मदद के लिए आएगा।
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए इस समझौते का नाम मक्का संयुक्त रक्षा समझौता है। हालांकि इसकी प्रवृत्ति को अमेरिका और यूरोपीय देशों के रक्षा समूह नाटो से मिलती है। इसके चलते इसे इस्लामिक नाटो भी कहा जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर आने वाले समय में भारत और पाकिस्तान के बीच फिर से संघर्ष होता है तो क्या होगा? भारत के पास अब क्या विकल्प बचे हैं?
इस्लामिक नाटो से बढ़ी भारत की मुश्किलें?
भारत और पाकिस्तान के रिश्ते पिछले कुछ समय से अपने सबसे निचले स्तर पर हैं। खासकर 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में पहमगाम में हुए आतंकी हमले और भारत की जवाबी कार्रवाई ऑपरेशन सिंदूर के बाद से दोनों देशों के बीच बातचीत लगभग बंद है। फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि दोनों देशों के रिस्ते कब बेहतर होंगे। ऐसे में पाकिस्तान का सऊदी और तुर्की के साथ रक्षा समझौता करना भारत के लिए चुनौतियां पेश कर सकता है।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्की ने खुले तौर पर न सिर्फ पाकिस्तान का समर्थन किया था बल्कि उसे हाई-टेक ड्रोन भी दिए थे। समझने वाली बात यह है कि तुर्की ने पाकिस्तान की मदद तब की थी, जब दोनों के बीच सुरक्षा को लेकर कोई बड़ा समझौता भी नहीं था। लेकिन अब दोनों मक्का रक्षा समझौते का हिस्सा है। ऐसे में अगर आने वाले समय में पाकिस्तान और भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष होता है और तुर्की इस्लामाबाद की मदद के लिए आता है तो यह भारत के लिए बड़ी समस्या होगी। माना जा रहा है कि पाकिस्तान भारत को घेरने के लिए इस्लामिक नाटो में जल्द ही बांग्लादेश को भी शामिल कर सकता है।
भारत और सऊदी अरब के रिश्तों पर असर
भारत के लिए सबसे बड़ी समस्या यह है कि इस्लामिक नाटो में पाकिस्तान और तुर्की के साथ सऊदी अरब भी इसका हिस्सा है। भारत और सऊदी अरब के बीच करीब 43 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार है। सऊदी अरब ने भारत में ऊर्जा, रिफाइनिंग, पेट्रोकेमिकल्स और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में 100 अरब डॉलर तक निवेश करने की इच्छा जताई है। सऊदी की सरकारी तेल कंपनी अरामको की भारत के पश्चिमी तट पर कई बड़ी परियोजनाओं में भी भागीदारी है।
इसके अलावा सऊदी अरब में 25 लाख से ज्यादा भारतीय काम करते हैं और हर साल बड़ी रकम भारत भेजते हैं। साथ ही सऊदी का कच्चा तेल भारत के लिए ऊर्जा आयात का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। यही वजह है कि दोनों देशों के मजबूत आर्थिक रिश्तों को हमेशा काफी अहम माना गया है। लेकिन अब पाकिस्तान के साथ सऊदी के नए रक्षा समझौते को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सऊदी अरब ने पिछले 11 महीनों में दूसरी बार अपनी सुरक्षा को पाकिस्तान की सुरक्षा से जोड़ा है। इससे भारत-सऊदी संबंधों पर संभावित असर को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।
समझौते का मकसद किसी को निशाना बनाना नहीं
तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप्प एर्दोगन ने इस समझौते को लेकर कहा कि सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुआ रक्षा समझौता किसी देश को निशाना बनाने के लिए नहीं है। पहले सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रक्षा समझौता था, अब इसमें तुर्की भी शामिल हो गया है। इस गठबंधन में तीनों देशों की अलग-अलग ताकत है। सऊदी अरब के पास आर्थिक ताकत है, पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार और बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, जबकि तुर्की के पास सैन्य अनुभव और मजबूत रक्षा उद्योग है।
एर्दोगन ने कहा कि यह समझौता संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 के तहत आत्मरक्षा के अधिकार पर आधारित है। इसका मकसद सुरक्षा सहयोग बढ़ाना, रक्षा क्षेत्र में संयुक्त परियोजनाएं शुरू करना और आतंकवाद से मुकाबला करना है। हालांकि, भारत के लिए यह समझौता चिंता का कारण बन सकता है। पाकिस्तान और तुर्की दोनों के साथ भारत के रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं।
एर्दोगन की बातों में सच्चाई की कमी
हालांकि कई रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि एर्दोगन के बयान में सच्चाई की कमी है। भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने कहा कि एर्दोगन जानते हैं कि वह हमेशा की तरह छल से भरी कूटनीति कर रहे हैं। अगर यह रक्षा समझौता किसी के खिलाफ नहीं है, तो फिर इसकी जरूरत ही क्यों पड़ी? क्या यह ऐसे खतरे से निपटने के लिए है, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं है? उनका मानना है कि एर्दोगन इस्लामिक नाटो को लेकर पूरा सच नहीं बोल रहे हैं।
भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष हुआ तो?
रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने हाल ही में इस मुद्दे पर बीबीसी से बात करते हुए कहा कि इस समझौते से भविष्य में भारत-पाकिस्तान संघर्ष की स्थिति और जटिल हो सकती है। उनके मुताबिक, अगर भारत पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों या सैन्य ठिकानों के खिलाफ ऑपरेशन करता है, तो पाकिस्तान इसे युद्ध की कार्रवाई बताकर सऊदी और तुर्की को भारत के खिलाफ जंग में शामिल होने के लिए कह सकता है।
चेलानी ने यह भी कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को चीन से तुर्की की तुलना में ज्यादा सैन्य मदद मिली थी। हालांकि, तुर्की की सीधी मदद से यह संकेत जरूर मिला कि भारत-पाकिस्तान संघर्ष की स्थिति में अंकारा इस्लामाबाद का साथ दे सकता है।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के पूर्व राजदूत टीएस तिरुमूर्ति भी इस समझौते को भारत के लिए चिंता का विषय मानते हैं। उनके मुताबिक, इससे तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान को क्षेत्र में अपना प्रभाव और रणनीतिक महत्व बढ़ाने का मौका मिल सकता है। उनके मुताबिक, यह बदलता समीकरण भारत के हित में नहीं है।
भारत के पास कौन-कौन से विकल्प
इस्लामिक नाटो मे सऊदी अरब से शामिल होने से भारत के पास सीमित विकल्प ही उपलब्ध है। जैसे भारत खाड़ी में सऊदी अरब के अलावा दूसरे मुस्लिम देशों से अपने रिश्ते और मजबूत करें। भारत और यूएई ने मई 2026 में रणनीतिक संबंधों को मजबूत करने के लिए कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। इनमें रक्षा साझेदारी, ऊर्जा सुरक्षा, कच्चे तेल का रणनीतिक भंडारण, शिप रिपेयर और निवेश से जुड़े समझौते शामिल हैं। दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार को 2032 तक 200 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य भी तय किया है। इसी प्रकार भारत ने दूसरे कई और मुस्लिम देशों से भी अपने रिश्ते मजबूत करने पर जोर दिया है









